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रविवार, 19 नवंबर 2017

ग़ज़ल १



ज़िद ही है तो कुछ यूं करो
धूप को मुटठी में बांधा करो
भूख लगकर मिटती भी तो है
जीने के लिए उसे मारा करो
इधर तुम और वो उस किनारे
इक हवा की नाव चलाया करो
दाद देनेवाले हैं बहुत पर कभी
पीठ पीछे खड़ा हो जाया करो
उसकी चूड़ियों में बनारस तो है
तुम मणिकर्णिका आ जाया करो 

सोमवार, 10 जुलाई 2017

टूटना एक नया जन्म भी है



टूटना एक सहज प्रक्रिया है. प्रकृति का नियम भी. जब मैं यह लिख रहा हूं, हर पल, समय की निरंतर धारा से टूट कर अलग हो रहा है. जब आप पढ रहे हैं, कुछ और पल टूट चुके होंगे. हम कहीं बैठें हों या सो रहे हों, लड़ रहे हों या फिर प्रेम कर रहे हों – यह टूटना जारी रहता है. टूटी हुई हर चीज अपनी जगह खाली करती है और वहां कोई और चीज आ जाती है. पेड़ से टूटे पत्ते को देखिएगा. टुकुर टुकुर उस डाल को निहारता रहता है, जहां से टूटा था. पीला होता जाता है. फिर हवा के झोंके उसे उड़ाकर कहीं और लेकर चले जाते हैं. आसपास किसी झाड़-झंखाड़ में फंस भी गया तो नियति उसकी वही है! सूख कर मिट्टी में मिल जाना. उसकी जगह उस डाल पर कोई नया पत्ता आ गया होता है.
अगर आप अपनी यादों को टटोलेंगे तो कोई बचपन की फूलदार कमीज या कोई हाफ पैंट याद आ जाएगी. पहन कर स्कूल जाते थे. नई-नई आई थी तो दोस्तों ने कहा अरे वाह तुम्हारी कमीज तो बहुत अच्छी है! उस कमीज का खयाल भी खूब रखा. लेकिन कद बढ गया, वो कहीं रह गई. हो सकता है मां ने स्टील के बर्तनवाले को देकर नया बर्तन ले लिया हो. लेकिन उसकी याद अचानक आ जाती है. उससे किसी ना किसी वजह से जुड़ाव था. वह कमीज टूटे वक्त का हिस्सा हो चुकी है अब. बस यादों की पगडंडी पकड़ उसतक जा सकते हैं. पकड़ नहीं सकते, देख नहीं सकते. आपके पास नई कमीज आ गई और ऐसी कई कमीजें आप पहनते-उतारते रहते हैं. हां एक ना एक दिन हर कमीज से आपका रिश्ता टूट जाता है. आखिरी वक्त में आप उससे नाता तोड़ निकल जाते हैं.
रिश्तों के साथ भी ऐसा ही होता है. बहुत सारे चेहरे अचानक सामने आ जाते हैं. कोई आदमी आचानक टकराता है. पूछता है- पहचान रहे हैं? बहुत जोर डालने पर भी वह चेहरा किसी बहुत पुराने चेहरे से मेल नहीं खाता. आप उसको देखते रहते हैं, दिमाग यादों के जंगल में उसके चेहरे-सा कोई चेहरा ढूंढता रहता है. कहीं स्कूल में तो नहीं था? या फिर कॉलेज में? हो सकता है किसी शादी ब्याह में कभी मिला हो? उस आदमी को पहचानने की कोशिश करते रहते हैं, उसे देखकर आधी बुझी मुस्कुराहट लिए खड़ा रहते हैं. थोड़ा बाल खुजलाकर, थोड़ा ठुड्डी रगड़कर, हां- हूं में बात जोड़कर, उसके बताने से पहले पहचानकर, एक जीतवाला भाव अनुभव करना चाहते हैं. वह आदमी आपकी जिंदगी का टूटा हुआ हिस्सा है. कभी कहीं साथ बैठा होगा. स्कूल में टिफिन साथ खाया होगा, बरसात में फुटबॉल खेला होगा और गलबहियां डालकर कीचड़ उछाला होगा, कहीं किसी पार्टी में मिल गया होगा और धीरे धीरे अपना सा हो गया होगा, या फिर कोई वह होगा जो बस या ट्रेन में सफऱ में मिल जाता है, यूं ही नजदीकी हो जाती है और फिर मिलेंगे कहकर विदा ले लेता है. लेकिन याद नहीं आ रहा. कुछ चेहरे तो पहचान में रहते हैं, ज्यादातर नहीं. ये आते-जाते चेहरे हैं जो मिलते हैं और फिर टूट जाते हैं. कमीज की तरह. जिस चेहरे को आपने देखा था अब वह वैसा नहीं है और ना तो कमीज वैसी की वैसी रहती है. ये बस पहचान के लिये होते हैं. सब समय हैं.
एक दिन अचानक कोई दोपहर याद आ जाती है और उसके मिट्टी का आधा खंडहर हो चुका मकान भी. किसी कोने में पड़ा बड़ा-सा संदूक और उसके पास घंटो कंचे खेलना. जो साथ में खेल रहे थे, कितने थे? पूरी तरह याद नहीं. अब कौन कहां है? एक दो की जानकारी हो भी, तो बाकियों के बारे में तो वाकई पता नहीं. वो चेहरे नहीं, छूटा हुआ वक्त हैं. भागती हुई जिंदगी में उतने समय के लिये वक्त ने उनसे जोड़कर रखा था. वे कुछ देर चलते रहे, फिर कहीं चले गए. जिंदगी ने आपको मौका नहीं दिया पीछे मुड़कर देखने और पूछ-परख करने का.
जाड़ों मे अलाव किनारे बैठकर बतियाने का फायदा ये होता था कि ऐसी बहुत सारी बातों और लोगों को समय की धूल झाड़-झाड़ याद किया जाता था. बतकहियों में वे उभरते रहते. जाड़ों की बात आई तो मुझे गांती याद आ गई. एक मोटी-सी चादर को माथे पर रखकर नीचे पैरों तक झुला दिया जाता और उसके सिरों को गर्दन के पीछे बांध दिया जाता. मैं सुबह जब भी बाहर निकलता मां गांती डाल देती. मकर संक्रांति यानी हमारे बिहार में खिचड़ी के मौके पर लाई को उसी गांती में लेकर घूरा ( अलाव ) किनारे बैठ खाने और यारों से बतियाने का मज़ा अब भी कहीं गुदगुदा जाता है. उस घूरे में कुछ आलू पका लेते तो कुछ बगल के गढ्ढे से घोंघा पकड़ उसको उसी में कुरकुरा बना लेते. फिर आराम से खाते रहते. ये सब टूटे हुए वक्त हैं- यादों की पगडंडी वहां तक जाती जरुर है लेकिन पकड़ नहीं सकते, देख नहीं सकते. ये घटनाएं या लोग बस वक्त हैं. उनको नाम, पहचान के लिये दे दिया जाता है.
जीवन अपने साथ कई समांतर रेखाएं खींचकर चलता है. बल्कि उनकी गिनती नहीं कर सकते आप. घर-परिवार से लेकर नाते-रिश्ते, प्रेम-घृणा, मतलब-कारोबार वगैरह-वगैरह की लकीरों पर चल रहे सैकड़ों लोग. सबकी जरुरतें, उम्मीदें औऱ उनसे आपका संबंध-साहचर्य. कहीं किसी कोने में बैठकर सोचिए कि कितने लोगों को जानते हैं आप. दिमाग औऱ यादों के पास कोई ऐसा साफ्टवेयर नहीं कि सारे नाम एक साथ याद आ जाएं. धीरे-धीरे आपकी लिस्ट बड़ी होती चली जाएगी. आपको लगेगा अभी तो पता नहीं कितने लोग छूट रहे हैं, जो हैं तो करीब लेकिन याद नहीं आ रहे. जब इत्मिनान हो जाए कि लिस्ट पूरी हो गई- तब भी यकीन नहीं रहेगा कि हां पूरी हो गई. अब देखिए कि इनमें से कितनों से आपने कब से बात नहीं की है. या कितनों को कितने साल से नहीं देखा होगा. लगेगा बहुत करीब ही कई हैं जिनसे हाय हेलो भी लंबे समय से नहीं हुई. ये हमारे रिश्तों की शाखों पर लगे पत्ते हैं. कुछ पता नहीं चलता कब गिर गए और कब उनकी जगह नए रिश्ते उग आए. इन तमाम रिश्तों में सबसे मजबूत प्रेम का रिश्ता होता है. मां का, पिता का, भाई-बहन का, औलाद का और पत्नी-प्रेमिका का. उनके पत्ते रिश्ते की शाखों से नहीं गिरते. अगर गिर भी गए तो उनकी जगह का निशान हमेशा दिखता है. उनका खालीपन नहीं भरता. फिर भी वे टूटते हैं. उनको यहां रहना नहीं है, कोई रिश्ता रहता भी नहीं. वह आपके जाने के साथ टूट जाता है. समय से टूटते पलों की बरसों लंबी कतार में खत्म हो जाता है. जो लोग याद रहते हैं, या फिर जिनको इतिहास, साहित्य, संस्कृति याद रखते हैं – वे लोग नहीं होते. सिर्फ विचार होते हैं. उनके चेहरे नहीं होते. उनके किए-कहे होते हैं. नाम बस पहचान भर के लिये होते हैं. उस पहचान से एक जाति, एक समाज, एक राष्ट्र या फिर एक संस्कृति अपने को जोड़कर अपनी पहचान बचाने की कोशिश करते हैं.
राम, कृष्ण, बुद्द, तुलसी, कबीर , पैंगबर मोहम्मद - अगर अभी कहीं चलने लगें तो कौन पहचानेगा? अब उनके चहरे महत्वपूर्ण नहीं, उनका कहा-किया इतिहास है. हम इतिहास ढोते हैं, इतिहास जीते हैं, इतिहास पहनते और बिछाते हैं, उसके नाम पर अपना पराया तय करते हैं, उसके आधार पर दोस्ती दुश्मनी तय करते हैं. किसी की जीत पर खुश और किसी की हार पर दुखी, इसी इतिहास की वजह से होते हैं. उसका कुछ भी आप नहीं देख सकते लेकिन उसका सबकुछ आपपर हावी होता है. आप समझें या नहीं, मगर वो आपपर सवार रहता है. दरअसल हम टूटे हुए को अपने भीतर भरते रहते हैं और उसके चलते अपने लिये चुनौतियां, परेशानी, मुसीबतें भी खड़ा करते हैं. अगर ठीक से समझें तो यह खाली जो हमारे भीतर भरा रहता है उसके चलते भी हम बहुत कुछ बड़ा कर लेते हैं. इसको आप स्वाभिमान, अस्तित्व, प्रेरणा जैसे शब्दों से जोड़ सकते हैं. टीम इंडिया की जीत पाकिस्तान पर होती है तो सारा देश झूमता रहता है. ऐसी खुशी किसी और जीत पर नहीं मिलती और ना ही टीम के भीतर वैसी आग किसी औऱ लड़ाई में दिखती है. यह हमारा टूटा हुआ समय है जो जुनून भर देता है. कोई अपने प्रेम के चलते कई सफलताएं हासिल कर लेता है, कोई दर्द को हथियार बनाकर वो कर गुजरता है जो शायद यूं उसके वश में नहीं था. हां, तो हम इतिहास या टूटा हुआ वक्त लिए चलते हैं- हर वक्त. वह हमारा धर्म तय करता है. धर्म यानी हम जो हैं. हम जो सोचते हैं और करते हैं. जैसे-जैसे हमारे अंदर वह टूटा हुआ बदलता रहता है- हम बदलते रहते हैं. यानी हमारे धर्म का कोई धर्म नहीं है. जिसके बारे में कल अच्छा सोच रहे थे उसके बारे में आज बहुत गलत सोच लेते हैं- यह उस टूटे हुए का ही दिया हुआ है. फिर भी, इस टूटन से ही जीवन है. इतिहास है. विचार है और विकार भी. प्रेम है औऱ घृणा भी. कल है और आज भी.

रात के आखिरी पहर का राग



कभी रात के आखिरी पहर में जगे हैं? मैं उनलोगों से नहीं पूछ रहा जो जगते ही हैं, बल्कि मेरा मतलब उनलोगों से है जो किसी वजह से बस जग गए. मसलन, वॉशरुम जाना था या कोई बर्तन गिर गया या तेज़ हवा ने खिड़की का पल्ला पटक मारा या फिर ऐसी किसी भी वजह से. थोड़ी देर में लगता है अब सोना नहीं चाहिए. हवा हल्की ठंड लिए आहिस्ता आहिस्ता चल रही है, आसमान एकदम साफ जैसे एक एक तारा गिन लो, चांद मानो बस नहाकर निकला है – आप सोचते हैं अब नहीं सोना है. ऐसा कहां मिलता है देखने को, निहारने को. आप बालकनी में आ जाते हैं या छत पर चले जाते हैं या फिर बाहर निकल जाते हैं. कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती. कहते हैं आवाज़ें कभी खत्म नहीं होतीं. वे जिंदा रहती है इसी ब्राम्हांड में. अनंत से जो कुछ आवाज़ बनकर निकला वह आज भी है. जो चीजें कभी नहीं बोलतीं, हम मान लेते हैं उनकी आवाज़ नहीं होती. लेकिन होती है. पेड़ों से हवा गुज़रती है या फिर पहाड़ों पर आंधी चलती है- तब आपको उनकी आवाज़ सुनाई देती है. पहाड़ की अपनी आवाज़ होती है, पेड़ों की अपनी. जैसे पानी की अपनी और आंधी की अपनी. किसी की आवाज़ एक-दूसरे से नहीं मिलती. विज्ञान इस बात पर शोध कर रहा है कि क्या किसी ने कभी कुछ कहा और वह रिकार्ड नहीं है तो उसे वापस सुना जा सकता है?
रात के चौथे पहर में आप बस यूं ही जग गए होते हैं और फिर नहीं सोने की सोच चुके होते हैं- हवा, आसमान, तारे, चांद में उलझे होते हैं, उस वक्त ये सारी आवाजें शायद सो रही होती हैं. ये वो वक्त होता है जब आपको हर सोती हुई चीज़ अच्छी लगती है. लेकिन यही वक्त आवाजों के जगने का भी होता है. कुछ लोग जगने का नाता ऐसी ही आवाज़ों से जोड़कर रखते हैं. दूर से गुज़रती ट्रेन की आवाज़, मंदिर में घंटी की आवाज़ या मस्जिद में अज़ान की- बहुत सारे लोगों की नींद अपना बिस्तर इन्हीं के चलते समेटती है. आवाज़ें जग रही होती हैं. दिन और रात की संधि का पहर है यह. इस समय आसमान का रंग तेजी से बदल रहा होता है. कहते हैं हवा सबसे ताज़ा इसी पहर में होती है. आयुर्वेद के मुताबिक इस समय अगर आप तांबे के बर्तन में रातभर रखा पानी नियमित पीते हैं तो पेट और खून के रोग नहीं होते. और भी कई फायदे हैं इसके. आयुर्वेद की भाषा में इसे उषा पान कहते हैं. योग भी इसी समय जगने की सलाह देता है. और आप बस यूं ही जग गए होते हैं. हवा, आसमान, तारे, आसमान में खो से गए होते हैं.
कभी इसी समय जयशंकर प्रसाद भी जगे होंगे. लिखा होगा- बीती विभावरी जाग री! अंबर पनघट में डुबो रही तार-घट ऊषा नागरी!. भव्य आकर्षण होता है इस पहर में. अगर प्रेम दिखता तो शायद ऐसा ही होता. प्रेम करने का भी शायद इससे खूबसूरत कोई पहर नहीं होता होगा. इसीलिए हमारे यहां अलग-अलग पहर के अलग- अलग राग भी बनाए गए और रात के आखिरी पहर के लिए जो राग रचे गए, उनमें एक अलौकिक दिव्यता महसूस होती है. राग भैरव सुनिए कभी. या राजकपूर की फिल्म जागते रहो का गाना “जागो मोहन प्यारे” सुनिए. राग भैरव पर ही सलिल चौधरी ने इसे सजाया था. तब तो शंकर जयकिशन के साथ राजकपूर की जोड़ी जम गई थी, लेकिन एक खास सिचुएशन के लिये जो गाना चाहिए था उसकी समझ सलिल चौधरी को ही थी, ये राजकपूर जानते थे. जिन गीतों में वक्त को बांधने की ज़रुरत रखी गई, उनको साधने में सलिल चौधरी बेमिसाल रहे. मेरा एक पसंदीदा गाना है- कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए. इसको भी सलिल चौधरी ने ही संगीत दिया. सुनिएगा तो लगेगा कि दिल से निकला हुआ कुछ दूर तक बस चला जा रहा है. यह गाना भी दो पहरों के संधिकाल पर है. जैसे अभी हम ठहरे हुए हैं- रात और दिन के मिलन के नज़दीक. हवा, आसमान, तारे और चांद में उलझे हुए. आवाजें जाग रही हैं. जानते हैं जब 24 घंटे पहरों में बांटे गए होंगे तो सबसे पहले रात के आखिरी पहर को ही रखा गया होगा. आठ पहरों में दिन रात – तीन घंटे या सात घटी का एक पहर. घटी मतलब 24 मिनट. हर घटी या पहर की अपनी तबीयत और तासीर होती हैं. मूड भी उनके मुताबिक बदलता या बनता है. इच्छा, अनिच्छा भी कभी-कभी पहरों के मुताबिक पैदा होती रहती है. इस समय यानी रात के आखिरी पहर में, भोर के किनारे, सिर्फ प्रेम-सा कुछ रहता है. अलौकिक, दिव्य, अनंत, प्रशांत. ये शायद उनको कम समझ में आता होगा जो आदतन इस समय जागते हैं. इसीलिए मैंने पहले ही कहा कि मेरा मतलब उनलोगों से है जो बस जग गए. सोने जागने की आवारगी कभी कभी यूं भी कुछ दे जाती है.
मेरे मित्र अभिसार शर्मा ने आज अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर एक पोस्ट लिखी और कहा कि "आखिर क्या गलत कह दिया अकबरुद्दीन ने? हां, उन्होंने बहुत इज्जत के साथ संबोधन नहीं किया" . अभिसार काफी सुलझे और पक्षपात से खुद को दूर रखने की कोशिश करनेवाले पत्रकार हैं. हमारी दोस्ती काफी गहरी है. लेकिन मुझे लगा यहां कुछ कहना जरुरी है. रात में अक्सर १२.३०- १ बजे तक पढने के बाद सोशल मीडिया का मुआयना करने आता हूं. सरसरी तौर पर देख-सुन कर चला जाता हूं. इसी क्रम में अभिसार की पोस्ट से टकरा गया और धक्का सा लगा!
सवाल ये है ही नहीं कि अकबरुद्दीन ने सम्मान-सूचक शब्द लगाए या नहीं. सवाल ये है कि देश के प्रधानमंत्री के लिये वह क्या कह रहे हैं? इससे बड़ी बात ये कि क्या अकबरुद्दीन को भी हम इतना वजनदार नेता मान लें कि उनके कहे-किए को सही गलत के चश्मे से देखने की कोशिश करें? कौम के नाम पर दो कौड़ी की राजनीति करनेवाले ऐसे नेताओं ने समाज और देश में सिर्फ ज़हर बोया है. ये दोनों तरफ है. अगर अकबरुद्दीन सही है तो कल कोई और साक्षियों, प्राचियों, तोगड़ियों को भी सही ठहराएगा. किसी भी नेता/पार्टी( कथित तौर पर भी अगर है तो) की राजनीति में फायदे का हिसाब-किताब होता ही है. मगर वह फायदा समाज और देश के बुनियादी ढांचे को चरमराने या फिर तोड़ने लगता है तो स्थिति खतरनाक होने लगती है. अकबरुद्दीन, जुनैद खान या पहलू खान या फिर अखलाक की चिंता नहीं कर रहे. उन्हें, उनकी मौत में फिरकापरस्ती के मजबूत होने की उम्मीद दिख रही है. बंद कमरे में ऐसे लोगों के होठों पर एक टेढी मुस्कान तैरती है, जो आम आदमी नहीं देख पाता. अगर अकबरुद्दीन की तरह के लोग ही हमारे देश के मुसलमानों के रहनुमा बन जाएं या फिर तोगड़िया जैसे लोगों में हिंदुओं को अपना खेवनहार दिखने लगे, तो देश विनाश के मुहाने पर खड़ा होगा. ऐसा होगा नहीं, क्योंकि इस देश की तहज़ीब और तासीर दोनों अकबरुद्दीनों और तोगड़ियों के खिलाफ हैं. मेरे लिए ये महज दो नाम नहीं हैं, बल्कि ज़हरीली सोच की दो जमातें हैं. अकबरुद्दीन ने जब दिसंबर २०१२ में आदिलाबाद की रैली में कहा था कि - "तुम सौ करोड़ हो ना और हम पच्चीस करोड़? १५ मिनट के लिये पुलिस हटाकर देख लो हम बता देंगे किसमे कितना दम है" . जानते हैं उसके करीब डेढ महीने बाद हैदराबाद के पास प्रवीण तोगड़िया की एक रैली थी. उसमें तोगड़िया ने अकबरुद्दीन का नाम नहीं लिया लेकिन कहा कि - " एक कहता है, पुलिस हटा लो, मैंने कहा 20 साल में जब-जब पुलिस हटी है, तब का देश का इतिहास देख ले। अगर तुझे पता नहीं है, तो आईने में इतिहास दिखा दूं।' तोगड़िया ने पिछले 20-25 साल में हुए दंगों का हवाला देते हुए कहा कि हमें चुनौती न दें।"
दोस्त! क्या कोई फर्क दोनों बयानों में है? ये एक धर्म के अस्तित्व और अभिमान के नाम पर लोगों को दिमागी तौर पर अपाहिज करने का खतरनाक खेल खेलनेवाले लोग हैं. ये एक-दूसरे को गाली नहीं देते. ये कौम को कौम से लड़ाने की साजिश करते हैं. ओवैसी परिवार की शानो शौकत और लाव-लश्कर कभी देख आओ. और हां तोगडिया जैसों का गुप्त राज समझ आओ. आपकी सोच की बुनियाद में इंसान, इंसानियत और नागरिक है ही नहीं तो फिर आपके कहे किए में कुछ अच्छा होगा, ये संभव ही नहीं. इसलिए अकबरुद्दीन कुछ भी कहें, हम उनको जैसे ही सही ठहराने की कोशिश करेंगे , हम खुद को किसी खाने-खांचे में अकारण ही खड़ा कर लेंगे. यह हमारे वह होने पर सवाल है, जो होने का दावा हम करते हैं या फिर ऐसा मानते हैं.
मेरा एक निजी अनुभव है. नींद आ रही है लेकिन चाहता हूं साझा कर लूं. बिहार के २०१५ के चुनाव थे. अक्टूबर का पहला हफ्ता रहा होगा. एक शो के लिये किशनकंज में था और उसी दिन अकबरुद्दीन भी वहां थे. दिन में उन्होंने मोदी के लिये उस रोज भी अपशब्द कहे थे. उनकी आदिलाबाद की रैली के समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और किशनगंज की रैली के समय प्रधानमंत्री. जुबान बिना लगाम चली थी. शैतान, हत्यारा और पता नहीं क्या क्या. रात में मुझे पूर्णिया निकलना था तो सोचा क्यों ना मिलता चलूं. जिस होटल में अकबरुद्दीन ठहरे थे, वहां गया. एक कमरे में कुछ लोग बैठे थे, उनको मैंने बताया कि मैं फलां हूं और मिलना चाहता हूं. कहा गया - आप बैठ जाइए, उनको हम बता देते हैं. जिन लोगों के बीच मैं बैठा था, उनमें से किसी से भी अच्छा इंसान होने के संकेत नहीं मिल रहे थे. उनके बीच बैठना भारी हो रहा था. तभी कोई कमरे में आया- आप आ जाइए. मैं उस कमरे में गया जिसमें अकबरुद्दीन थे. कुर्ता पायजामा में खाने की तैयारी कर रहे थे. दुआ-सलाम के बाद बोले - आइए ना साथ ही खा लेते हैं. मैंने कहा - नहीं, मैंने अभी खाना खाया है, आप खा लें. वैसे मैं चाहता हूं कि आप थोड़ी देर कैमरे पर बात कर लें, आज की रैली औऱ बाकी बिहार के चुनावों को लेकर- मैंने लगे हाथ कह डाला. बोले भाई जान कैमरे पर अभी कुछ मत कहलवाइए. चुनाव के बाद ज़रुर बात करुंगा. मैंने कहा - ये जो आप आज रैली में कह रहे थे उससे आपको क्या मिलेगा? सर, यही तो आप नहीं समझ सकते- अकबरुद्दीन ने कहा. एक टेढी मुस्कान उनके चेहरे पर थी औऱ आंखें मुझसे कुछ दूर पर खड़े दूसरे इंसान की तरफ. मैंने उसे देखा. वह भी वैसे ही मुस्कुरा रहा था. ये बंद कमरों की मुस्कुराहटें थीं. ये इंसान के आंसुओं की वजहें ढूंढती हैं. उसके खून-खराबे का माल तैयार करती हैं. ये दोनों तरफ होती हैं. ऐसी मुस्कुराहटों को सजानेवालों के हक में कुछ भी बोलना, अपनी साख पर अनजाने में ही सही, सवाल खड़ा करना है. शुभ रात्रि