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मंगलवार, 11 मई 2021

पंकज भाई! सैल्यूट है आपको



कोरोना डायरी 18 अप्रैल 2021

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मेरी स्टडी की खिड़की के बाहर शहर कितना जमगम-सा है. किसी को अंदाजा भी नहीं हो सकता कि रोशनी में डूबी इन बस्तियों में कई परिवारों को अंधेरे ने घेर रखा होगा. दूर-दराज से लोग आते हैं, अपनी छोटी-सी दुनिया बनाते हैं, कहने के लिए ही सही लेकिन अपनों की एक फेहरिस्त रखते हैं, छोटे-बड़े सपनों के पीछे भागते रहते हैं और अचानक किसी आफत की बेड़ियों में जकड़ लिए जाते हैं. इन दिनों कोरोना की बेड़ियां नहीं बल्कि अजगर-पाश लोगों को जकड़ रहा है. आज सारे रिकार्ड टूट गए हैं. संक्रमण के 2 लाख 60 हजार नए मामले आए हैं और लगभग डेढ हजार लोगों ने दम तोड़ा है. जब से कोरोना का हमला चल रहा है, देश में एक दिन में ना तो इतने लोग चपेट में आए ना इतनों की मौत हुई.
आज संक्रमण के जो दो लाख 60 हजार मामले आए हैं, उनमें एक मामला आदित्य उपाध्याय का भी रहा. दो साल पहले अपनी बेटी और बेटे के साथ पति-पत्नी घर आए थे. आदित्य की पत्नी सुधा, मेरी पुरानी सहकर्मी रही हैं. लगभग 10 साल पहले साथ काम किया था और तब से गाहे-बगाहे हालचाल पूछने के लिए कॉल कर लिया करतीं हैं. कभी-कभार किसी आयोजन वगैरह में मुलाकात भी हो जाती. उनके जरिए ही उनके पति को जाना और दोनों जब सपरिवार घर आए तो फिर जीवन की सारी नाप-जोख पता चल गई.
समय सपनों को ऊंचाई देता जाता है और हैसियत को बौना करने लगता है, तब इंसान सबसे ज्यादा तना और तकलीफ में होता है. मध्यम वर्ग का पारंपरिक परिवेश यही है. आगे जो करना है, वह चुनौती है और पीछे ऐसा कुछ है नहीं जिससे थोड़ी भी मदद ली जा सके. हम ही गुजरा हैं, हम ही आज और हम ही कल हैं. जरुरतों की कतरब्योंत और रोज-रोज की जोड़-गांठ से ही मध्यम वर्ग की गृहस्थी चलती है. सुधा और आदित्य भी इसी का हिस्सा हैं. बेटा क्रिकेट में अच्छा है और बेटी पढने में. दोनों अच्छा कर जाएं इसी खातिर दोनों पति-पत्नी दिन-रात खुद को खपाए रखते हैं.
आज सुधा का दिन में फोन आया. मैं एडिटोरियल मीटिंग में था. एक बार ख्याल आया कि पहले मीटिंग कर लेता हूं, फिर कॉल बैक कर लूंगा. लेकिन हाथ बढ गया, फोन उठ गया- हां सुधा बोलो. “सर, इनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, हालत अच्छी नहीं है, सांस उखड़ रही है, बहुत बेचैनी है और बढती जा रही है.” सुधा ने बिना दुआ-सलाम पति की जो हालत थी बताई. मैने कहा- ऑक्सीमीटर है? नहीं सर- जवाब आया. स्टीम दी हो? हां सर, दो बार. अभी एक काम करो, ऑक्सीमीटर किसी दवा दुकान से ले आओ और देखो ऑक्सीजन लेवल कितना है- मैंने कहा. “जी सर, देखती हं, लेकिन इनको एडमिट कराना होगा, बहुत प्रॉबलम में हैं.” मेरी मीटिंग के साथी सुन रहे थे. मीटिंग रुकी थी और बातों से सबको अंदाजा हो गया था कि कोई सीरियस केस है. सुधा ने फोन रखा और ऑक्सीमीटर के लिए चली गई. मैने मीटिंग शुरु कर दी. 20-25 मिनट बाद जब प्राइम टाइम का एडिटोरियल प्लान मैं मेल कर रहा था, सुधा का फोन आया. सर, इनका ऑक्सीजन लेवल तो 58 है. क्या? मैं जैसे कुर्सी में ही उछल पड़ा. तुम इनको लेकर जल्दी भागो. पास में कोविड का कोई अस्पताल है? कुछ भी करो सुधा तुरंत एडमिट करवाओ- मेरी आवाज ऊंची हो गई थी. “सर मुझे कुछ नहीं पता. पास में यशोदा है लेकिन वो ऐसे तो लेंगे ही नहीं, आप ही कुछ करिए सर.” वो बदहवाश-सी थी. वैशाली के आसपास कोविड का कोई अस्पताल जिसमें तुरंत एडमिशन हो जाए, जरुरी था. मैंने अपने गाजियाबाद के रिपोर्टर जतिन को फोन लगाया. सारी बात बताई और कहा कि कोई जुगाड़ करो कि कम से कम तुरंत इलाज शुरु हो जाए. मेरे दिमाग में ऑक्सीजन लेवल खतरे की घंटी की तरह बज रहा था. सुधा औऱ उसके दोनों बच्चों के चेहरे नजर आ रहे थे. जतिन को बोलने के बाद मैने कौशांबी में यशोदा अस्पताल के मालिक पीएन अरोड़ा को फोन किया. मरीज की हालत बताई और गुजारिश की कि अरोड़ा जी एडमिट कर लीजिए,जिंदगी का सवाल है. वे बेचारे देर तक अपना रोना रोते रहे. “कैपेसिटी से ज्यादा लोग हैं सर, कहीं कोई जगह नहीं है. मामला कोविड पेशेंट का है इसलिए ऐसा भी नहीं है कि कहीं भी इलाज करवा दें, आपके लिए कभी मना करता हूं? हालत तो आप देख ही रहे हैं. बहुत बुरा चल रहा है.” मैने कहा- अरोड़ जी, मुझे सब पता है लेकिन अभी ये एडमिशन जरुरी है. उन्होंने कहा- सर जैसे ही कोई बेड खाली होता है, मैं आपको फोन करता हूं. इसबीच जतिन का फोन आया. सर, एक नवीन अस्पताल है, उसमें एक बेड का इंतजाम किया है लेकिन वो बस जल्दी आ जाएं. मैने कहा- तुम फोन रखो, मैं उसको अभी बोलता हूं. पता चला एंबुलेंस के लिए सुधा ने फोन तो डीएम को भी कर दिया लेकिन घंटे भर बाद भी एंबुलेंस आई नहीं है, हां उसके ड्राइवर का दो-तीन बार फोन आ गया कि मैं एंबुलेंस का ड्राइवर बोल रहा हूं, आपके यहां आ रहा हूं. सुधा! घंटे भर में एंबुलेंस नहीं आई, तुम कार चला नहीं सकती तो वो फिर वो जाएंगे कैसे? मैंने लगभग डांटनेवाले अंदाज मे कहा. सर, मैं कुछ करती हूं, नहीं होता है तो ऑटो देखती हूं. लेकिन उनको लेकर कहां जाऊंगी? उसके दिमांग में अचानक ये सवाल कौंधा. तुम निकलो तो, मैं देखता हूं. किसी ना किसी अस्पताल में एडमिट करुंगा, तुम बस निकलो. मेरी बात खत्म हुई कि जतिन का फोन आया- सर उनको बोलिए जल्दी आएं. बेड की बहुत मारामारी है. तुम रोक कर रखो मैं उसको भेज रहा हूं- कहते हुए मैने फोन रखा. इस दौरान मैंने यूपी के मुख्यमंत्री और डीएम को टैग करते हुए ट्वीट किया कि क्या एंबुलेंस एक घंटे में भी नहीं पहुंचती? ऐसे में किसी की जान चली जाए तो?
इमरजेंसी है, मरीज को तुरंत ले जाना है- इसतरह का आग्रह जिला कलेक्टर से करने औऱ उनके आश्वासन के बावजूद डेढ घंटे बाद एंबुलेंस आई. नतीजा ये हुआ कि नवीन अस्पताल में जो बेड था उसपर एक क्रिटिकल पेशेंट को डाल दिया गया. अब कोई रास्ता बचा नहीं था. मैंने पीएन अरोड़ा को फिर फोन किया. वही बातें दोहराई और उन्होंने भी अपना पुराना राग ही अलापा. बात फिर नहीं बनी. इस दौरान मैंने नोएडा विधायक और मित्र पंकज सिंह, गाजियाबाद के सांसद जेनरल वीके सिंह औऱ पूर्व केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा को टैग कर इस केस में मदद करने के लिए ट्वीट किया. इसके कुछ देर बाद पीएन अरोड़ा का फोन आया- “सर आपके पेशेंट का नाम क्या है?” आदित्य उपाध्याय- मैने कहा. “उनको भेज दीजिए यशोदा वहां मेरे मैनेजर हैं, मैने उनको बोल दिया है.” मैने फोन रखते ही सुधा को क़ॉल लगाया. तुम यशोदा पहुंचो फटाफट और मैनेजर से मिलो. पहुंचते ही एडमिशन हो गया औऱ इलाज शुरु हो गया. मरीज की हालत गंभीर थी, बिना आईसीयू के बचाना मुश्किल होगा- शायद यह बात पीएन अरोड़ा को मरीज देख रहे डॉक्टरों ने बताई होगी. उनका मेरे पास फोन आया. मैने छूटते ही कहा- अरोड़ा जी, बहुत शुक्रिया आपका. उस आदमी के बच्चे बेचारे अनाथ हो जाते, अगर उसको कुछ हो जाता तो. अरोड़ा जी ने मेरी बात पूरा होने के बाद कहा- सर वो तो ठीक है, लेकिन मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं. “आपका पेशेंट क्रिटिकल है. हिज सरवाइवल इज क्वैशचनेबल एंड आई डॉन्ट हैव एनी बेड इन आईसीयू.” मैंने कहा – अरोड़ा जी, आपके अस्पताल में एक आदमी इसलिए मर जाएगा क्योंकि आपके पास आईसीयू में बेंड नहीं है. बोले – “सर क्या करुं? मैंने आपको पहले बतना जरुरी समझा. इलाज चल रहा है, दवाएं सारी दी जा रही हैं, बट हिज बॉडी इज नॉट प्रॉपरली रेस्पॉन्डिंग.” मेरी उनकी बात चलती रही. मैने कहा आप इलाज कीजिए लेकिन कोई ऐसा इंताजम कीजिए कि उनको जो ट्रीटमेंट चाहिए वो मिल जाए. मैंने फिर ट्वीट किया- जान चली जाएगी इस इंसान की अगर आईसीयू में एडमिशन नहीं मिला तो. छोटे-छोटे बच्चे हैं. प्लीज हेल्प. मैने सुधा का नंबर भी डाल दिया. टैग वही लोग थे- पंकज भाई, वीके सिंह और महेश शर्मा. थोड़ी देर में पंकज सिंह की टीम से भूपेंद्र का फोन आया. “भैया, विधायक जी अभी पीएन अरोड़ा से बात किए हैं और डीएम से भी किए है. बोले- केस सीरियस है और आईसीयू चाहिए. आप परेशान मत होइए, कुछ कर रहे हैं. वैसे पेशेंट की हालत टीक नहीं है.” मैंने कहा- भूपेंद्र! मैं जानता हूं ठीक नहीं है, लेकिन क्या दिल्ली-एनसीआर में एक बड़े अस्पताल में कोई इसलिए मर जाएगा क्योंकि आईसीयू में बेड नहीं है? हम उसकी खातिर लड़ेंगे नहीं? “नहीं भैया, आप ठीक कह रहे हैं, सब हो रहा है, हो जाएगा. बस थोड़ा टाइम और”- भूपेद्र ने कहते हुए फोन रखा.
दफ्तर में काम का दबाव अलग होता है, हर घंटे की लड़ाई चलती है, कई जगहों पर नजर रखनी पड़ती है औऱ आप उससे फारिग नहीं हो सकते. इसलिए वो भी चल रहा था. थोड़ी देर में पंकज भाई का जवाबी ट्वीट था- यशवंत जी, आदित्य उपाध्याय को उपचार मिल रहा है, मै अस्पताल के संपर्क में हूं, उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूं. मैंने उनको शुक्रिया कहा. लेकिन आईसीयू जरुरी था और मेरा दबाव इसी बात के लिए था. मैने सुधा को फोन लगाया- क्या हो रहा है? सर, आईसीयू में ले जा रहे हैं. कह रहे हैं अरैंजमेंट हो गया है. हम्म्म्म्म. चलो कोई दिक्कत होगी तो बताना. मैने फोन रख दिया. तभी पंकज सिंह या पंकज भाई कह लीजिए ( मैं उनको ऐसे ही पुकारता हूं ) का एक और जवाबी ट्वीट आया – यशवंत जी, आदित्य जी को आईसीयू में बेड मिल गया है, उनका इलाज जारी है, उनके शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामना. मेरे पास शब्द नहीं थे. आंखें गीली थीं. खिड़की के बाहर खाली आसमान और खामोश सड़क थी. दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू है. पता नहीं यह दौर कबतक चलेगा, इंसान रोज मरने के डर में जीता है और नहीं मालूम ऐसा कबतक चलेगा - मन में यह सोचते हुए दो घूंट पानी पिया. कुर्सी से उठकर, बांयी तरफ से टेबल का चक्कर लगाते हुए खिड़की के पास पहुंचा. उससे लग कर खड़ा हो गया. एक बच्चा भारी सा थैला लिए, देह को सड़क की तरफ दबाए चला जा रहा था. उसके भी मां-पिता होंगे, उनके भी सपने होंगे कि मेरी औलाद कुछ बने, लेकिन हालात..... पता नहीं मां-बाप होंगे भी या नही! अब भी आसमान और सड़क का हुलिया थोड़ी देर पहले वाला ही था. सोचा नीचे जाकर टलहते हुए एक कप चाय पी लूं, फिर काम करुंगा.
रात के 9.30 बज रहे थे, मैं अब घर निकलने की सोच रहा था. फोन बजा. सुधा का था. “सर, अब ठीक हैं, मैं अंदर गई थी, बात की उन्होंने, मैं घर जा रही हूं, बच्चे अकेले हैं, वह भी यही बोले कि चली जाओं, मैं ठीक हूं.” मैने पूछा – आदित्य तुमको ठीक लगे? “हां, सर ठीक है.” मैने कहा फिर घर चली जाओ. कोई रिश्ता नहीं है इन दोनों से लेकिन कुछ तो है जो उसके अंदर मुझसे एक उम्मीद जोड़ता है. उसी उम्मीद से सवा करोड़ के इस शहर में उसने मुझे कॉल किया था. कुछ वैसी ही उम्मीद से आज मैने तीन नेताओं को ट्वीट में टेग किया. लेकिन खड़ा सिर्फ पंकज सिंह हुए. उनका क्षेत्र भी नहीं है- गाजियाबाद. वे नोएडा के विधायक हैं, चूंकि मैने मदद मांगी थी, इसलिए वे क्षेत्र के दायरे से बाहर आकर अपनी कोशिश में लग गए. उनकी टीम संपर्क में आ गई. वे खुद जवाब देते रहे. अगर आदित्य उपाध्याय की जान बच गई है तो सिर्फ पंकज सिंह के चलते. हां, अरोड़ा जी के कारण भी. मेरे लिहाज में ही सही लेकिन उन्होंने मरीज को अपने यहां बुला तो लिया और बाद में आईसीयू में दाखिल भी कर दिया. मगर जिन दो नेताओं की तरफ से कोई हरकत तक नहीं हुई, वे भी तो यहीं के हैं. जन प्रतिनिधि कहलाने का शौक तो उनको भी चर्राता है! लेकिन जब आम आदमी जिंदगी की जंग लड़ रहा होता है तो ये क्या करते हैं? इसका जवाब भी तो इनको देना चाहिए. पार्टियों की पालकी पर बैठकर विधायकी या सांसदी का सेहरा बांधने भर से कोई जन प्रतिनिधि नहीं होता. उसके लिए जनता का दर्द समझना जरुरी है. खैर, पंकज भाई, आपको धन्यवाद नहीं कहूंगा क्योंकि यह शब्द बहुत छोटा है, उस इंसानी फर्ज के आगे जो आज आपने निभाया. सैल्यूट!!!

फरिश्ते आसमान से नहीं आते.



 कोरोना डायरी 17 अप्रैल 2021

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सुबह के साढे आठ बज रहे थे. फोन उठाया तो लरजती सी आवाज आई. "भैया, अब जरुरी है. उनको सांस लेने में दिक्कत है और ऑक्सीजन लेवल नीचे आ रहा है. एडमिट कराना ही होगा." बीती रात एक बजे के आसपास यही फोन आखिरी था. एक मित्र के पुराने बॉस की तबीयत बिगड़ गई थी. कुछ दवाएं लेकर वो ठीक तो थे लेकिन डर बना हुआ था. इसी डर को लेकर रात में उसने फोन किया था. मैने ढाढस बंधाते हुए कहा था- चिंता मत करो. जरुरी नहीं कि कोरोना हो. अगर उनको परेशानी महसूस हो तो तुरंत फोन करना, कहीं एडमिट करवाया जाएगा. इसी के साथ गुडनाइट हो गई. यह फोन जैसे ही रखा मेरे सीईओ का फोन आया. एक साथी के पति की स्थिति भी वैसी ही थी. ऑक्सीजन लेवल नीचे जा रहा था. 90 के नीचे चला गया था. एक डॉक्टर मित्र की सलाह पर एस्ट्रॉएड दिया था, जिसके कारण वो 90-92 के आसपास आ गया था. सलाह ये थी कि कल सुबह एडमिट कराना ही होगा. मैंने सीईओ का फोन रखने का बाद उस दोस्त को फोन किया जिसके पति की तबीयत बिगड़ रही थी. परेशान थी. "कहीं कोई बेड नहीं है. रेमडेसिविर तो मार्केट से खत्म है. इनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी है." फोन उठाते ही वो एक सुर में बोलती चली गई. मैने कहा- धीरज रखो. सब अच्छा होगा. अगर सुबह से पहले भी परेशानी होती है तो फोन कर देना.
इन दोनों मामलों के चलते सोते सोते करीब डेढ बज गए. सुबह जगा और चाय पीकर जैसे ही दफ्तर फोन लगाने की सोच रहा था कि फोन आ गया- "भैया अब जरुरी है...एडमिट करना ही होगा". मैंने कहा तुम डिटेल्स दो. नाम, पता, दिक्कत और कांटैक्ट नंबर सब लिख दो. कुछ ही देर में मैसेज में सारा डिटेल्स आ गया. मामला दिल्ली का था, इसलिए मैंने आम आदमी पार्टी में सीएम के नजदीक काम करनेवाली टीम को मैसेज डाला. लब्बोलुबाब ये था कि ये आदमी अच्छा पत्रकार है, जमीनी-जुझारु है और इसका एडमिशन जरुरी है. मैंने जिन लोगों को मैसेज डाले, जवाब सबका आया. सबने थोड़ा समय मांगा. लेकिन जो आदमी सक्रिय रहा, वो थे दिलीप पांडे. दिलीप, मेरे लिए छोटे भाई की तरह हैं. लेकिन ऐसे वक्त में जब दिल्ली के किसी भी अस्पताल में- चाहे सरकारी हो या प्राइवेट या फिर कोई छोटा मोटा नर्सिंग होम- जगह नहीं है, मरीज पर मरीज चढा पड़ा है, धक्कम-धुक्की, चीख-पुकार चरम पर है, वैसे में किसी मरीज का दाखिला हो जाए, यह आसान नहीं. दिलीप मेरे साथ लगातार संपर्क में रहे औऱ मरीज के तीमारदार के भी. एक घंटे बाद दाखिला हो गया. इतना ही नहीं मेरे मित्र का बाद में मैसेज आया कि - सर बहुत-बहुत धन्यवाद. पहली बार- कोई दिक्कत तो नहीं- यह पूछने के लिए लगातार फोन आए. दिलीप या उनकी टीम उस वक्त सक्रिय नहीं होते तो जो आदमी अब बेहतर महसूस कर रहा है, उसकी सांसे उखड़,चुकी होतीं. वैसे, आम आदमी पार्टी के जितने भी लोगों को मैंने कहा वो सभी आखिर तक संपर्क में रहे. जैस्मिन शाह, कोर टीम के अहम सदस्य हैं, विकास, दिन भर अपने सीएम की प्रेस कांफ्रेंस काटने के लिए चढा रहता है- सब मरीज तक अपने संपर्क सूत्र बनाए हुए थे. हां, दिलीप की सक्रियता हमेशा याद रखनेवाली है. एक नेता, एक जन प्रतिनिधि को अपने दायित्व को लेकर और खासकर ऐसे संकट काल में कितना सजग रहना चाहिए, दिलीप उसकी मिसाल हैं. यह इकलौता मामला नहीं है. उस आदमी के दिन-रात आजकल लोगों की मदद और राहत में ही गुजर रहे हैं.
खैर, यह काम जब चल रहा था तो दूसरी जिम्मेदारी भी चलने लगी थी. मेरी मित्र के पति की परेशानी बढने लगी. रात की तरह ही पहला वाला फोन रखा ही था कि मेरे सीईओ का सुबह फिर फोन आया. यार, तुरंत कुछ करना होगा. मैंने बात खत्म होते ही दिल्ली के तीन-चार बड़े डॉक्टरों को फोन लगाया ताकि उनको एक रुम दिलवा सकूं. इलाज, सहूलितय और सुविधा के साथ चाह रहे थे, वॉर्ड जैसी स्थिति का सामना करना नहीं चाहते थे, इसलिए काम थोड़ा मुश्किल था. मैने उन्हीं डॉक्टर मित्रों को फोन किया था जिनके पास अच्छे प्राइवेट अस्पताल हैं. लेकिन कहीं कोई रुम खाली ही नहीं था. उनकी लाचारी मैं समझ रहा था. यह सब करते-धरते चार-पांच घंटे निकल गए. उधर तबीयत बिगड़ती जा रही थी. आखिर में मैने छोटे भाई सरीखे डा. रजत को फोन किया. उसने कहा - भैया भारी भीड़ है, लेकिन आपका कहा मैं टाल भी नहीं सकता. मुझे उनका नंबर दीजिए, एक बार बात करके केस समझ लूं. मैने नंबर दे दिया. थोड़ी देर में फोन आया- भैया इनको एडमिट करना ही होगा, आप थोड़ा समय दीजिए, मैं उनके लायक कुछ इंतजाम करवाता हूं. रजत गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल को चलाते हैं. नौजवान डॉक्टर और कुशल प्रबंधक है. निहायत शरीफ और व्वहारकुशल. फोन रखते समय मैंने कहा - तुम जो करो लेकिन यह एडमिशन होना चाहिए और उनका इलाज तुरंत शुरु हो जाना चाहिए. करीब दस मिनट बाद रजत का फोन आया. "भैया मैंने इंतजाम कर दिया है, आपकी दोस्त से भी बात कर ली है और कहा है कि आप अपने पति को लेकर तुंरत आ जाएं. अब आप निश्चिंत रहिए, उनकी जिम्मेदारी मेरी है." घंटे भर बाद मेंरी दोस्त का फोन आया- "एडमिशन हो गया है, बहुत अच्छा इंतजाम है, बहुत ख्याल कर रहे हैं. आई एम हाईली थैंकफुल". जो सुबह रो रही थी, उसकी आवाज में सुकून था. ये रजत का कमाल था. रजत न जाने कितने लोगों के काम आते हैं. उनमें पेशेवरपना कम, इंसानियत और रिश्तों की कद्र ज्यादा है.
आज अगर दो जिंदगियों पर से खतरा टला तो सिर्फ और सिर्फ दो वैसे लोगों की वजह से जो कोरोना के इस भयावह दौर में टूटती उम्मीदों को थाम रहे हैं. जब जमाए-आजमाए लोग निराश कर रहे हैं, ऐसे में ये लोग फरिश्ते-सा काम आ रहे हैं. किसको आती है मसीहाई किसे आवाज दें.....! बहुत-बहुत शुक्रिया दिलीप पांडे और डा. रजत.

कोरोना की एक सुबह



धरती उतनी ही गोरी है

आज भी
वही सुनहरी सूर्य रश्मियाँ
नदी वैसी ही शांत साँवली सी
रास्ते अब भी
हर पते तक जाते हैं
छतों में घुल रही है
गुनगुनाहट धीरे धीरे
घरों में लोग जगे बैठें हैं
चुपचाप
ठीक समय पर आया था
सूरज
ठीक समय पर होगी
साँझ
दिन चाहे जितने कठिन हों
प्रकृति, निरंतर चलने का
सिद्धांत नहीं बदलती।

रविवार, 19 नवंबर 2017

ग़ज़ल १



ज़िद ही है तो कुछ यूं करो
धूप को मुटठी में बांधा करो
भूख लगकर मिटती भी तो है
जीने के लिए उसे मारा करो
इधर तुम और वो उस किनारे
इक हवा की नाव चलाया करो
दाद देनेवाले हैं बहुत पर कभी
पीठ पीछे खड़ा हो जाया करो
उसकी चूड़ियों में बनारस तो है
तुम मणिकर्णिका आ जाया करो