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सोमवार, 30 नवंबर 2015

कितना मुश्किल है माँ होना...



कितना आसां है कुछ भी होना 
कितना मुश्किल है माँ होना. 
Even God can't be as great as mother happens to be..!!
जुगनू दिखाकर वो तारों की कहानी कहती है
परिंदों के नाम के निवालों की थाली रचती है
देह से लगाती जैसे प्याली में प्याली रखती है
झील देखती जैसे सूरज, औलाद को तकती है
उसके कारण ही जिंदा हूं गीली आंखों कहती है
दुनिया तेरी तू जाने, वो मां है, मां सी रहती है

सोमवार, 2 नवंबर 2015

साहस


साहस- आसमान से नहीं आता
पाताल से भी नहीं निकलता
हवा, पानी औऱ नमक तक में
नहीं होता साहस.
तलवार, बंदूक या फिर गोलों में भी
नहीं हो सकता
साहस, कहीं होता है
हाड़, मांस या मज्जा में ही
ज़िंदा लोगों में होता है - साहस.

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

चलो छोड़ो भी अब

कितनी जरुरी लगती है, बस इक बात ही तो है
हर बात अधूरी लगती है, बस इक बात ही तो है.
कुछ तो है जो रुकता है, गोया सांस रुक गई
तुम कहते हो क्या है, बस इक बात ही तो है.
जोड़-घटाकर जिंदगी क्यों हिसाब करे मुझसे
सब तो हारे बैठा हूं, बस इक बात ही तो है.
तुम्हारी नीदों के परिंदे रात भर उड़ाता अगर
उड़कर मेरे पास आते, बस इक बात ही तो है.
उम्मीद का मारा फिर से उम्मीद लगाए बैठा है
शायद बहुरेंगे अबकी दिन, बस इक बात ही तो है.

शनिवार, 12 सितंबर 2015

किनारे


आधे गीले 
आधे सूखे
पानी और ज़मीन से
मुंहजोड़ चलते रहते हैं किनारे.
कभी ज़मीन खींच ले जाती है आगे
कभी पानी पीछे धकेल जाता है
अपने मन के कभी नहीं रहते
लेकिन नदी भरमन थामे रहते हैं किनारे.
कोई टूटी नाव
कोई उजड़ा गाँव
शव की बची राख
टूटी सूखी शाख
सबका इकलौता आसरा होते हैं किनारे.
आती जाती लहरें देखते हैं
सीने पर लोटती लहरें देखते हैं
बाट जोहती लहरें देखते हैं
देह कुरेदती लहरें देखते हैं
ना पकड़ सकते ना समेट पाते
प्यास की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं किनारे.
दायरा तोड़कर न नदी रह पाई
न सफ़र ख़त्म हो पाया कभी
जो बाज़ार में बैठा था
उसको घर नहीं मिला
जो इंतज़ार में लेटा था
वो सफ़र पर नहीं निकल पाया कभी
पहचान की पहली ज़रूरत होते हैं किनारे.