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रविवार, 24 मई 2015

एक बात

     
ना भी कहते, पता था, फिर क्यों 
आदमी तनहा था, रहेगा, फिर क्यों
बात थी बहुत नुकीली, उफ़्फ़ तौबा
रुह छिली, साँस सीली, फिर क्यों
नींद की आँख, काँच की रेत
इश्क़ दरिया, चढ़ा-खड़ा, फिर क्यों
एक तू, एक मैं और एक सवाल
रूह-रूह पानी, पता है, फिर क्यों

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

भोजपुरी ग़ज़ल




कोई याद आ गइल बिहाने बिहाने
जात चांद  मुस्कुराइल बिहाने.
चाक पर नाचे माटी मन मोर हो गइल
कोई घूंघट में सरमाइल बिहाने बिहाने.
कोयल तान छेड़े गमकल बा आमवाड़ी
कोई ओटे अझुराइल बिहाने बिहाने .
सांस के धागा सांसे के गांठ पड़ गइल
मन अचके गदराइल बिहाने बिहाने. 

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

खयाल भी एक कविता है



तुम्हारा स्पर्श
जैसे बादल की देह में
रेशा रेशा उतरता पानी धीरे धीरे.
तुम्हारी सांस
जैसे संदल की जड़ों से
ज़मीन में फैलती खुशबू धीरे धीरे
तुम्हारी हंसी
जैसे धूप में गिरती
बारिश की बूंदे धीरे धीरे.
औऱ तुम्हारा खयाल
जैसे अभी अचानक
गोद में झड़ते गुलमोहरी पल धीरे धीरे.

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

शिकायतें




कई बार बहुत लाचार देखा है
जिसने चिट्ठी पकड़ाई
उसी ने पता छुपा रखा है.
अल्हड़ हैं, कभी कभी शऊर पा जाती हैं.
तेजकदम लौट आती हैं
कटी पतंग जैसे अचानक हाथ आ जाती है.
भादो का जैसे भारी बादल
जब चल नहीं पातीं हैं
हल्का होने तक बरसती रहती हैं.
नींद से अक्सर उलझती हैं
चैन के परिंदे उड़ाती हैं
मन में अंधड़ उगाती हैं.
रिश्तों के रेशे खींच खींच परखती हैं
गिरह गांठ ढूंढती हैं
रात जैसे जंगल में चलती है.
उड़ता हुआ कागज का आवारा टुकड़ा
किसी का लिखा ढोता हुआ
किसी और के पते पर पड़ा हुआ
आधी मिट्टी आधा पानी
आधी हवा आधी रोशनी
अंधेरे के खेत में धूप की फसल