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बुधवार, 8 अप्रैल 2015
मंगलवार, 11 नवंबर 2014
शनिवार, 11 अक्टूबर 2014
शिकायतें
कई बार बहुत लाचार देखा है
जिसने चिट्ठी पकड़ाई
उसी ने पता छुपा रखा है.
अल्हड़ हैं, कभी कभी शऊर पा जाती हैं.
तेजकदम लौट आती हैं
कटी पतंग जैसे अचानक हाथ आ जाती है.
भादो का जैसे भारी बादल
जब चल नहीं पातीं हैं
हल्का होने तक बरसती रहती हैं.
नींद से अक्सर उलझती हैं
चैन के परिंदे उड़ाती हैं
मन में अंधड़ उगाती हैं.
रिश्तों के रेशे खींच खींच परखती हैं
गिरह गांठ ढूंढती हैं
रात जैसे जंगल में चलती है.
उड़ता हुआ कागज का आवारा टुकड़ा
किसी का लिखा ढोता हुआ
किसी और के पते पर पड़ा हुआ
आधी मिट्टी आधा पानी
आधी हवा आधी रोशनी
अंधेरे के खेत में धूप की फसल
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014
नए राज्य में किसान की पहली आत्महत्या
रयावरम गांव में सात साल का वम्शी एक सवाल है
उसकी चुप्पी बेहद खतरनाक है
बहुत सोचा होगा उसके बाप ने
जब वो बेटे से मिलने आखिरी बार जा रहा था
स्कूल के पास एक दुकान पर चुपके से बुलाया
बालों में हाथ फेरा, सीने से लगाया
फिर धीरे से पाकेट में हाथ डाला
कुछ देर टटोला
चीकट सा पांच का नोट निकाला
मिठाई खाते बेटे को देर तक निहारता रहा
फिर बोला- देखो खूब पढना और कुछ ज़रुर बनना
बेटा, मेरी कसम है किसान कभी मत बनना
वम्शी का बाप एक घंटे बाद घर में लटका मिला
देश में किसान की आत्महत्या पर फिर हाय तौबा
और फिर अपाहिज सन्नाटा मिला ।
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