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गुरुवार, 15 नवंबर 2012

लता मंगेशकर


             
              (1) 
मुहल्ले में निपट सन्नाटा है
गली की दीवारों-खिड़कियों पर दोपहरी चिपकी पड़ी है
एक घर के ओसारे में चूड़ियां खनकती हैं
चूड़ीहारिनें, सुहागिनों की कलाइयों पर
कांच की चूड़ियां सजा रही हैं
उन लाल पीली हरी नीली चूड़ियों में
सपनों का सिंदूरी रंग उतरा है
दरवाज़े के पीछे से झांकती नयी-नवेली के होठों के गीले कोरों पर
रेशमी गीत सजता है – मोरा गोरा अंग लईले, मोहे श्याम रंग दईदे .

                            (2) 
शहर से गांव जाती सड़क के किनारे  
ईंट-भट्टे के पोखर में चांद डोल रहा है
अंधेरा टेरती, राह टोहती बस की खिड़की के पास बैठी
देखौनी से लौटती लड़की का मन चांद में उलझा है
ठीक वैसे ही जैसे एक शाम किसी के हाथ में कलाई उलझ गई थी
रातभर सीने से रेडियो चिपका चांद निहारती रही  
मन आज भी उलझा है
पोखर में रात उतरती जा रही है, चांद डोल रहा है
आधा है चंद्रमा, रात आधी ।  

                              (3)

शहर में रोशनी के खेत लहलहा रहे हैं
भीड़ और शोर का अंधड़ चल रहा है
बाल और बैग संभालता हिंदी पट्टी का टटका नौजवान
पिज्जा पीढी की बाला की गलबहियां डाले स्वप्नखोरी पर निकला है
अचानक रोशनी का साया घना हो जाता है और लड़की के सीने में
धान की बालियों में उतरते रस की तरह खदबदाहट होती है  
लड़के की हथेलियों से रेशमी आग का रेला
रगों में उफनने लगता है
यहां से वहां तक हैं चाहों के साये, ये दिल और उनकी निगाहों के साये 

                (4)

बस्ती से दूर पुराने मंदिर पर सांझ उतरी है
घंटा बज रहा है, शंख फूंका जा रहा है
धरती से आसमान तक हवा सुगंधित हो गई है
मंदिर के गर्भगृह में एक दीया जल रहा है
दीये की शिखा से रागिनियों के प्रकाश-पुंज फूट-फूट
दिग दिगंत में फैल रहे हैं
आकाशगंगाओं तक गंधर्व सुर-पर्व मना रहे हैं
भारतवर्ष में नदियों का साझा स्वरोत्सव चल रहा है
सत्यम शिवम् सुंदरम्

बुधवार, 7 नवंबर 2012

आम आदमी



                   

मैं एक टुकड़ा समय का बिस्मिल यारा
कभी उड़ता, गिरता, कटा-सा बिस्मिल यारा

कुछ चादरों की सिलवटों में
कुछ वफा की बंदिशों में
कुछ यादों की किस्तों में
बंट गया, रह गया यारा.

कुछ नदी की तलहटों में
कुछ हवा की हरकतों में
कुछ पर्वतों की करवटों में
दब गया, रह गया यारा

कुछ हिना की खुशबुओं में
कुछ सपनों ki बाजुओं में
कुछ बारिश-सी इनायतों में
सज गया, रह गया यारा

कुछ उम्मीदों की रोटियों में
कुछ गरज की बोटियों में
कुछ मोलभाव की पेटियों में
पक गया, रह गया यारा

मैं एक टुकड़ा समय का बिस्मिल यारा
कभी उड़ता, गिरता, कटा-सा बिस्मिल यारा.

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

मैं हत्यारा बनना चाहता हूं






मैं हत्यारा बनना चाहता हूं
मैं चाहता हूं भरे चौराहे पर उस दरिंदे को गोली मार दूं
जिसने स्कूल से आती
तीन साल की मासूम का बलात्कार किया है.

मैं उस बाग वाले की बांह काटना चाहता हूं
जिसने अमरूद की चोरी के लिये
एक टूअर-टापर बच्चे को
पीट पीटकर मार डाला है .

मैं उस जुलूसवाले को जिंदा जलाना चाहता हूं
जिसने भूख से लड़ते लोगों की खेप खरीदी
उन्हें उकसाया-भड़काया
और अब उनकी लाश पर अपनी गोटियां सेंक रहा है.

मैं उस मिलावटखोर की खाल उधेड़ना चाहता हूं
जिसने दूध को भी ज़हरीला बना दिया
गोद की गोद सूनी हो गई
और उसके फॉर्म हाउस पर रातभर दावत जमी रही.

मैं उस खादीवाले का ख़ून करना चाहता हूं
जिसने किसानों की खून-पसीने की मेहनत को
मंडी में कौड़ियों के मोल कर दिया
और दलालों-कारोबारियों से सोने की जूतियां ले गया.

मैं उस पुलिसवाले को बम से उड़ा देना चाहता हूं
जिसने एक बेकसूर की रिहाई के लिए
उसकी बेटी की चीख-सनी बोटियां रातभर नोचीं  
खबर छपी- गरीबी से आजिज परिवार ने नहर में कूदकर जान दी.

मैं उस हुज़ूर माई-बाप को बचे रहने देना नहीं चाहता
जिसने इंसाफ का बड़ी सफाई से ख़ून कर दिया
आस में उठी आंखें पथरा गईं
और गुनाह के घर में ठ़हाकों से भर गए.

हां मैं हत्यारा बनना चाहता हूं
मैं किसी को छोड़ना नहीं चाहता
अगर तुम्हें मेरा इरादा ठीक लगता है तो साथ आओ
हाथ मिलाओ, हथियार उठाओ और चल पड़ो
चल पड़ो क्योंकि हत्यायें ज्यादा करनी होंगी
दुनिया में ये अपनी तरह की पहली क्रांति होगी
जिसमें हत्यारों से हज़ारगुना ज्यादा मरनेवाले होंगे . 

इससे पहले कि हमारे इरादे की उन्हें खबर लगे
इससे पहले कि हमारे चारों ओर सायरन बजे
इससे पहले कि सलाखों के पीछे हमपर बूटें चलें
इससे पहले कि हमपर देशद्रोह का तोहमत लगे
चल पड़ो – कि आज कुछ कर गुज़रते हैं
सबसे पहले नामर्दी की हत्या करते हैं
भीड़ की मुर्दागीरी को मारते हैं
नपुंसक नारों, गद्दार इश्तहारों को मारते हैं
अपाहिज अवतारों, स्खलित विचारों को मारते हैं
चलो चलें , क्योंकि समय बहुत कम है
और हत्यायें बेहिसाब करनी हैं.

मेरी एक ग़ज़ल





गीली छत में रह गयी आंखें, निंदिया जाओ ना
बरसाती रातों का सवेरा, अच्छा लगता है
            गांव में फसलों की खुशबू है, तुम भी आओ ना
            बस्ती में बंजारों का डेरा, अच्छा लगता है
शहर के चौराहों के बच्चे, एकदिन बोलेंगे
शीशे के उस पार का चेहरा, अच्छा लगता है
            मेरे लाखों चाहनेवाले, वो नहीं तो क्या
            मेरे दिल पे उसका पहरा, अच्छा लगता है
सबकी ईद है, सबकी दीवाली, सबकी होली रे
क्या करता है तेरा-मेरा, सब अच्छा लगता है