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बुधवार, 12 मई 2021

रिश्ते में कभी अपना पराया नहीं होता

 कोरोना डायरी 22 अप्रैल 2021 

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मेरे मित्र और बड़े भाई सरीखे विकास मिश्रा ने पोस्ट लिखी। किसी ने फोन किया कि पढिए। मैंने पढी। विकास जी सहज और मेरी तरह ही भावुक इंसान है। उन्होंने बहुत कुछ ऐसा लिखा जिसको लेकर मैं हमेशा असहज हो जाता हूं। रिश्ते में कभी अपना पराया नहीं होता। कुछ रिश्ते जीवन में कई अधिकार औऱ जिम्मेदारियों के साथ होते हैं, विकास जी के साथ भी वैसा ही रहा है। विकास जी ने जिस रंजना की खातिर बीती रात पोस्ट डाली, वह मुझे आधी रात दिखी। आजकल पोस्ट, मैसेज इतने होते हैं कि समय लगता है, देखने और जवाब देने में। आधी रात ही मैंने दिल्ली सरकार की तरफ से काम देख रहे अपने छोटे भाई जैसे दिलीप पांडे को वह मैसेज भेजा। जवाब तुरंत आया- भैया थोड़ा समय दीजिए। सुबह तक रंजना के करीबी का दाखिला हो गया। बाद में उसने मैसेज किया कि विकास भैया की तरह अब जीवन भर आप भी मेरे भाई । रिश्तों के रेशे अपनापा का पानी लिये हमेशा ताजा और मुलायम रहते है। विकास जी, जिंदादिल, खुशमिजाज, गुदगुदी से भरे और महफिली इंसान हैं। उनकी कोशिश के चलते एक इंसान की जिंदगी मुश्किल से बाहर आई।

आज एक डॉक्टर के बर्ताव से काफी तकलीफ हुई और गु्स्सा भी आया। देहरादून के मेरे एक मित्र हैं, उनकी भांजी गुड़गांव में रहती है। समूचा परिवार कोरोना पॉजिटिव है। किसी के भी बाहर जाने की हालत नहीै है। ससुर गुड़गाव के सेक्चर 84 के जेनेसिस अस्पताल में भर्ती है। उनको पहले आईसीयू में डाला, फिर निकाला। बाद में कहा चेस्ट इंफेक्शन है। आगे बताया कि बढ रहा है रेमडेसिविर देना पड़ेगा। मरता क्या ना करता। परिवार ने दिलवाया, लेकिन यह कैसे हुआ ये कहानी फिर कभी। एक डॉक्टर हैं वहां भावेश। बताया गया कि यही देखते हैं। मैंने फोन कर कहा कि देखिए गोपाल सिंह आपके यहां एडमिट हैं, उनके परिवार के सारे लोग पॉजिटिव हैं। कोई देखने नहीं आ सकता और आपलोग जिसतरह से परिवार को बता रहे हैं, उससे उनका डर बढता जा रहा है। खयाल रखिए। इस डॉक्टर का तेवर ऐसा हुआ कि जैसे उसने मरीज ने गुलाम रखे हैं। छूटते ही कहा सुनिए अगर प्रॉब्लम है तो आप खुद एक आदमी को रखिए जो उनकी देखरेख करे। गुस्सा मुझे भी आया था लिहाजा मैंने कहा कि सुनिए वो आपके मरीज हैं और उनका ख्याल रखना आपका काम है। इसके लिए आप मोटी रकम वसूल रहे हैं। आगे कुछ कहता उससे पहले डॉक्टर ने फोन रख दिया। बाद में मैंने इसकी शिकायत सीएम ऑफिस तक की। गोपाल सिंह फिलहाल उसी अस्पताल में हैं।
दिन में गाजियाबाद के वसुंधरा से एक सज्जन का मैसेज आया। एक परिचित का हवाल देकर लिखा था - मरीज की हालत नाजुक है। नाम विनय पांडे और ऑक्सीजन लेवल 35 है। पढते ही दिमाग चकरा गया। 35 के ऑक्सीजन लेवल का आदमी अभी तक है तो ईश्वर की मेहरबानी है। मैंने अपने गाजियाबाद रिपोर्ट जतिन गोस्वामी को मैसेज भेजा और फोन किया। जो कर सकते हो करो लेकिन इस आदमी को बचाना जरुरी है। जतिन ने दो घंटे की जद्दोजहद के बाद उस आदमी का एडमिशन करवाया। मैंने रात मे पूछा मैसेज करनेवाले से भाई कैसी है अब तबीयत । बोले सर सुधार है। ईश्वर है तो सुनेगा।
दिन में एक मैसेज आया गुड़गांव के एक कोविड पॉजिटिव हितेश बागला के लिए। उम्र 43 साल औऱ ऑक्सीजन लेवल 58। यह मामला भी क्रिटिकल था। मैने गुड़गांव में इंडिया न्यूज के रिपोर्टर राज वर्मा को फोन लगाया। राज, मैंने एक व्हाट्रसैप मैसेज भेजा है। ऑक्सीजन लेवल 58 है, तुरंत एडमिशन चाहिए। राज ने घंटे भर बाद फोन किया - सर हो गया। राज वर्मा औऱ जतिन गोस्वामी ने देश और समाज की जरुरत के इस दौर में शानदार काम किया है।
एक आदमी ऐसा है, जिसके बारे में मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं शायद इन दिनों तीन-चार घंटे सो रहा हूं। लेकिन वो आदमी इतना भी सोता होगा या नहीं, मैं नहीं कह सकता। दिलीप पांडे। आम आदमी पार्टी के विधायक हैं और दिन रात लोगों के इलाज का इंतजाम करने में लगे रहते हैं। मेरी तरह पता नहीं कितने लोग होंगे जो तुरंत अपना काम होने का दबाव डालते होंगे। क्या मजाल दिलीप कभी ना कह दें या ऊब जाएं। समय इंसान का कभी-कभी ही इम्तिहान लेता है। जो लोग बुनियादी तौर पर सही होते हें, वही उस इम्तिहान को पास करते है। दिलीप के साथ ऐसा ही है। मेरे एक मित्र की बुआ शालिमार गार्डन में अकेली रहती हैं। ऑक्सीजन लेवल गिर रहा था लेकिन 90 था। फोन आया- बुआ जी को तुरंत एडमिशन चाहिए। मेरे ब्योरा दिलीप को भेजा। थोड़ी देर में एक व्वॉयस मैसेज और एक नंबर आया । भैया कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज में भेजिए, वहां 90 से ऊपर के ऑक्सीजन लेवल के मरीजों का एडमिशन हो रहा है, अच्छा इंतजाम है। कोई दिक्कत हो तो मेरे रेफरेंस से इस नंबर पर बात करवा दीजिएगा, जो भेजा है। हो गया।
दिलीप के काम को मिसाल के तौर पर ऱखा जाना चाहिए। मेरे साथ रिश्ता अलग है। डांट-डपट भी कर दूं तो जी भैया हां भैया करके सुन लेंगे। लेकिन मैं आप लोगों के लिए दिन रात लड़ते हुए मैं उस आदमी को देख रहा हं। समय बहुत बुरा है, जब यह तूफान गुजरेगा फिर दिलीप के काम का अंदाजा होगा। आज मैने कहा तुम इतना लगे हो, दिल्ली की सारी परेशानियां जानते हो, थोड़ी देर के लिए चैनल पर लाइव बैठ जाओ औऱ बताओ क्या समस्या है। दिलीप ने कहा- भैया मुझे नहीं लगता मैं कोई बड़ा काम कर रहा हूं। मैं दुखी ज्यादा हूं। मुझे अभी इन्हीं लोगों के बीच रहने दीजिए। समय कहीं और जाएगा तो किसी की जिंदगी का सवाल बन जाएगा। रहने दीजिए। बस, इतने से ही आप दिलीप को समझ सकते हैं।
देर रात नोएडा पुलिस का मैसेज आया । जो सिपाही कोरोना पॉजिटिव हो चुके हैं, वो प्लाज्मा दे सकते हैं। उनका संपर्क नंबर कमिश्नर ऑफिस ने साझा किया था। 8851066433। पुलिस कमिश्नर आलोक जी ( मैं उन्हें आलोक भाई कहता हूं) ने पुलिस की भूमिका को सुरक्षा के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारियों से जोड़ा है। किसी भी सवाल पर खुले दिल से सुनने और समझने के लिए तैयार रहते हैं। कल मैने जिक्र किया था कि नोएडा के सेक्टर 39 के सरकारी अस्पताल में पूर्णिया के मेरे एक मित्र नीतेश भाई के जाननवाले एडमिट हैं और उनका कोई इलाज हो ही नहीं रहा। मरीज इस बात से परेशान है कि उसको कोई दवा ही नही दी जा रही है। उनके चेस्ट का सीटी स्कैन करना है, हुआ नहीं। मैने इस बारे में नोएडा के डीएम, कमिश्नर को ट्वीट किया और बताया कि मरीज कितना डरा हआ है। आज उस मरीज की पूछ परख हुई तो उसको थोड़ी राहत मिली। यह आलोक भाई की वजह से हुआ होगा ऐसा मेरा यकीन है। कल उस आदमी का चेस्ट सीटी करवाना जरुरी है।
मेरे मोबाइल और फेसबुक के इनबॉक्स भरे हुए हैं। मध्य प्रदेश, महाराषट्र, यूपी, बिहार से लोग अपनों के इलाज के लिए संदेश दे रहे हैं। दिल्ली एनसीआर तो है ही। लेकिन मैं कोई संस्थान नहीं हूं। नौकरीपेशा एक अदना सा इंसान हूं। अगर जिला प्रशासन और सांसद विधायकों की पूरी लिस्ट हो तो मैं अपना सारा समय लगाकर लोगों के इलाज का प्रबंध करुं। मगर लोग इतनी मुसीबत में हैं कि उनको इससे क्या मतलब कि मेरी हैसियत इतनी नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके अपने का इलाज हो जाए। जान बच जाए। सैकड़ों की तादाद में लोग अपना साथ, समर्थन और सदभावना भेज रहे हैं। मैं जानता हूं कि वे इस देश के ऐसे नागरिक है जो अच्छे की उम्मीद करता है। अच्छी व्यवस्था, अच्छी सत्ता, अच्छा समाज और अच्छे लोग। लेकिन वह ऐसा कुछ भी नहीं पाता तो जहां भी उसको थोड़ी उममीद दिखती है, वह उसको पालने पनपाने में लग जाता है। मैं फिर कहता हूं कि मैं एक नौकरीपेशा साधारण सा नागरिक हूं इस देश का। कुछ शर्तो और उसूलों पर जिंदगी जी है। उनसे समझौता नहीं करता। देश की आजादी के 74 साल बाद भी रोटी, इलाज, पढाई एक चुनौती है तो सवाल तो है। लेकिन इसका दोष सिर्फ नेताओं पर ही डाला जाए, वह भी सही नहीं। समाज ने भी खुद को तैयार नहीं किया। खैर, ये ऐसा मामला है जिसपर लंबी बहस हो सकती है। लेकिन मैं चाहता हूं कि तमाम जिलों के कलेक्टर, सीएमओ, सांसद ओर विधायक और अस्पताल चलानेवाले ड़ॉक्टर अगर थोड़ी मदद करें तो ऐसी कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं जो सिर्फ कुछ लापरवाहियों के कारण जान गंवा बैठती हैं। मैं दो लोगो का यहां जिक्र करना चाहूंगा। एक मेट्रो अस्पताल के ओनर और पद्मविभूषण डा. पुरुषोत्तम लाल और दूसरे कैलाश अस्पताल के मालिक डा. महेश शर्मा। इन दोनों लोगों ने कुछ ऐसे मामलों में सहयोग किया है, जिसमें सब हाथ से फिसलता लग रहा था। इन दोनों की भूमिका मैने पेशेवर कम इंसानी सरोकार से जुड़ी ज्यादा देखी है।
पिछले कुछ दिनों में फेसबुक फ्रेंड्स रिक्वेस्ट की बाढ सी आ गई है। मेरा कोटा पहले से ही भरा हुआ है। इसलिए मेरे फेसबुक पेज को आप सब फॉलो कर लें तो मैं वहां भी आपसे जुड़ा रहूंगा। बहुत सारी उम्मीदों और मदद के मैसेज हैं आपके, मैं कोशिश करता हूं कि सबका कुछ कर पाऊं लेकिन आप यूं समझिए कि तीन-चार घंटा सोने के अलावा मैं अपने दफ्तर की जिम्मेदारी और आपके काम में ही लगा रहता हूं। बहुत औऱ जायज तरीके से यह लाजिमी है कि मैं वो सब ना कर पाऊं जो मुझसे आप चाहते हैं। लेकिन जो कुछ भी कर पा रहा हूं, वह कुछ ऐसे ही लोगों की मदद से जो बेहतरीन इंसान है औऱ इस भयावह समय में वे हर हद पार कर लोगों की मदद करने की रोजाना कई कामयाब कोशिशें करते हैं। उन सबका जिक्र कभी तफ्सील से करुंगा। इस वक्त तो बस आप अपने परिवार के साथ सुरक्षित रहिए और हर सावधानी बरतिए।

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं..

कोरोना डायरी 21 अप्रैल 2021  

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देश में आदमी डरावने तरीके से छटपटा रहा है। सरकारें कहती हैं, इलाज का इंतजाम है, परेशान होने की जरुरत नहीं है। यहां लोग हैं जो अपनों को लिए दर-दर भटक रहे हैं, रिरिया रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं। सांस की परेशानी ने जिंदगी मोहाल कर रखी है। मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लग रहा, बार बार अस्पतालों के मालिकों, विधायकों, सांसदों या फिर अपने सहयोगियों को फोन करना। ऐसी स्थिति आनी ही नहीं चाहिए। देश के हर नगारिक के पास खाने औऱ बीमार होने पर इलाज कराने के लाले नहीं पड़ने चाहिए। मेरे पास जो जिम्मदारी है, वह खुद में समय और समर्पण मांगती है। लेकिन इतने लोग परेशान हैं और मदद के लिए फोन, मैसेज, फेसुबक के जरिए संपर्क कर रहे हैं कि लगता है, इनको कैसे छोड़ा जा सकता है। हर संभव कोशिश कर रहा हूं यह जानते हुए कि यह तरीका कुछ लोगों के लिए तो काम कर सकता है लेकिन व्यवहारिक नहीं है। कोई भी आदमी इतने बड़े पैमानी पर मची तबाही में अपने दस बीस जाननेवालों के जरिए वो कर ही नहीं सकता, जिसकी जरुरत है। यह तो व्यवस्था का मामला है। चुस्त, दुुरुस्त, तैयार औऱ तत्पर। लेकिन व्यवस्था अगर चौकस होती तो इतने लोग सांस-सांस के लिये छटपटा क्यों रहे होते? घर-परिवार के लोग बदहवास इधर-उधर क्यों भागते फिरते?

यह व्यवस्था ही है कि नासिक में ऑक्सीजन लीक होने से 22 लोगों की जान चली गई। यह व्यवस्था ही है कि शहडोल मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन खत्म हो जाने के चलते 22 लोग तड़प कर मर गए। लोग मर ही तो रहे हैं। कार में, सड़क पर, अस्पताल के बाहर। ऊपर से कालाबाजारी औऱ दलालों की चांदी आई हुई है। जान बचाने की खातिर इंसान अपनी सारी देह बेचने तक को तैयार है। इस मौके को ये गिद्ध अपनी नस्लों को मालामाल करने के मौके के तौर पर देख रहे है। पाप और नीचता के जरिए आई ऐसी कमाई से किसकी औलादें फली-फूली हैं, मैं नहीं जानता। लेकिन इंसान को इसी धऱती पर अपने किए का हिसाब देकर जाना होत है, ये पता है।
मैं अपनी जिम्मेदारी निभाने के साथ लोगों की जान बचाने, कुछ लोगों को राहत पहुंचाने के लिए जो बन पा रहा है, कर रहा हूं। इसमें कोई सुख या आनंद नहीं मिल रहा । लेकिन इंसान होने के नाते लगता है कि किसी के काम आ गया तो जाता क्या है। जिदंगी से बड़ी कोई चीज नहीं होती। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म भी नहीं। कुछ साथी हैं जो कहने पर पूरी कोशिश कर रहे हैं मदद देने और मरीज को इलाज दिलवाने में, उनका मैं धन्यवाद भी नहीं कर सकता, क्योंकि उनका काम ऐसे औपचारिक शब्दों से कहीं बड़ा और मूल्यवान है। कुछ विधायक दोस्त, कुछ डॉक्टर मित्र और मेरे कुछ सहयोगी गजब का साथ दे रहे हैं। उनके सामने तो मेरे दोनों हाथ जुड़े हैं।

मंगलवार, 11 मई 2021

लोगों के भरोसे पर खरा उतरने कि कोशिश

 कोरोना डायरी 21 अप्रैल 2021 

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आप जब कुछ करते हैं तो अपने स्वभाव,संस्कार और इंसानियत के नाते करते हैं। उसका कारण ढूंढेंगे तो मिलेगा भी नहीं। मैंने कोविड के इस भयावह समय में लोगों को अपनों को बचाने की खातिर लाचार देखा, बेबस देखा। इंसान जब मुसीबत में होता है, खासकर जब जान पर बन आती है- उसके या उसके अपनों की, तब वह उसी को याद करता है, जिसपर उसका सबसे ज्यादा भरोसा होता है। यह सिर्फ समझने वाली बात है। जिसपर गुजरी होगी, उसको समझने में देरी नहीं लगेगी। मुझे भी किसी ने अपने भाई और किसी ने अपने पति की खातिर फोन किया। जान नहीं बचेगी यह लग गया था, लेकिन एक उम्मीद थी कि इस वक्त भी इलाज मिल जाए तो शायद जिंदगी बच जाए। ठीक ऐसे ही वक्त पर उन लोगों ने फोन किया, जिनको मैं अपना कहता हूं या वे कहते होंगे कि हां इस शहर में उनको मैं जानता हूं या जानती हूं। मैंने उन लोगों को इलाज मिले इसकी खातिर सिस्टम को झकझोरा। जीवन भर मैं लिहाजी रहा।अपने लिए कुछ कहने में हमेशा हिचक रही । लेकिन इन मामलों में मैंने अपनी पूरी ताकत लगाई और उसका फल ये रहा कि जिंदगियां बचीं। अगले दिन जब फोन आता है कि सर अब बच जाएंगे, ठीक हैं, शरीर के अंदर कुछ अच्छा सा पसरता हुआ लगता है। शायद वह आत्मा या रुह के उल्लसित होने से होता होगा।

मेरे एक सहयोगी पिछले तीन दिनों से कोरोना की चपेट में हैं। कल जब मैंने तबीयत जानने के लिए फोन किया तो सांस उखड़ रही थी। बोले सर, ब्रीदिंग प्रॉब्लम है। चेस्ट का सीटी स्कैन कराना बहुत जरुरी है, कहीं भी करवा दीजिए। मामला नोएडा का था इसलिए मैंने पंकज सिंह जो यहां के विधायक हैं, उनको कहा। फौरन जवाबी फोन आया- मेट्रो अस्पताल भेजिए, अभी करवा रहे है। सीटी स्कैन हो गया । आज रिपोर्ट आई, चेस्ट में थोड़ा इंफेक्शन है। उनकी पत्नी दवा लेने के लिए निकली, मगर एक दवा मिल नहीं रही थी। मेरे पास फोन आया। मैंने कहा तुम थोड़ा समय दो मैं खुद कुछ जगहों पर तफ्तीश करके बताता हूं । लेकिन फेविफ्लू 400 नहीं मिली। आखिरकार उन्ही लोगों ने यहां से 800 किमी दूर इस दवा का इंतजाम करवाया। कल 11 बजे वह दिल्ली के एक हिस्से तक पहुंचेगी । मैने कहा – कल बता देना कहाँ से उठाना है, किसी को भेजकर मंगवा लूंगा।
दोपहर में कानपुर के एक सज्जन ने ट्वीट के जरिए रिक्वेस्ट की – सर, एक बेड चाहिए ऑक्सीजन के साथ कानपुर में, पेशेंट का ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा है, अगर मदद मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी। साथ में फोन नंबर भी था। मेरे पापा को आज बुखार आ गया। मैं डर गया। तुरंत अपने मित्र और यशोदा अस्पताल के मालिक रजत अरोड़ा को बताया। उन्होंने फ़ौरन एक आदमी भेजा – एंटी जेन और आरटीपीसीआर टेस्ट, दोनों के लिए। एंटी जेन निगेटिव आया तो थोड़ी राहत मिली । अब आरटीपीसीआर रिपोर्ट का इंतजार है। पापा को मैने आइसोलेशन में डाल दिया है। उन्हीं के चलते आज ऑफिस नहीं गया। जब मैं उनके इलाज, टेस्ट और दवा में लगा था, उसी दौरान यह ट्वीट आया । मैने मेरे कानपुर के तेज तर्रार रिपोर्टर राहुल को मैसेज डाला।लिखा ये जरुरी केस है, करवा दो। राहुल ने करवा दिया। पता तब चला जब जिन्होंने गुजारिश की थी उन्होंने ही ट्वीट पर बहुत सारी दुआएं डालीं।
एक फोन आया। लखनऊ में एक परिवार पॉजिटिव है। वह अब बाहर नहीं जा सकता और घऱ में खाने-पीने के सामान से लेकर दवा तक नहीं है। आसपास के लोगों को फोन कर रहे हैं, लेकिन वे मदद करने को तैयार नहीं है। उनका पता, नंबर सब मैसेज में आ गया। मैंने लखनऊ के लोगों और प्रशासन से निवेदन किया कि इस परिवार को सामान पहुंचाया जाए। कई लोगों ने मुझे दवाई भेजनेवाली दुकानों के नाम पता दिए, मैंने परिवार के साथ साझा किया। कुछ लोगों ने खाना सप्लाई करनेवालों के बारे में भी बताया। शाम तक जाकर उस परिवार की मश्किल हल हो गई।
दिन में कई मैसेज आते रहे। किसी को प्लाज्मा की जरुरत तो किसी को दाखिले की। जितना बन पाया किया। कुछ हुआ कुछ नहीं। लेकिन जो नहीं हुआ वह कल भी नहीं होगा, ऐसा नहीं है। शाम में मेरे एक छोटे भाई सरीखे सज्जन का फोन आया। उनके एक दोस्त मुरादनगर में रहते हैं। कोरोना पॉजिटिव हैं और उनका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा था। उनको तुरंत एडमिशन की जरुरत थी। आजकल अस्पतालों में किसी को भर्ती करवाना नाको चने चबाने जैसा हो गया है। मुझे उस वक्त एक ही नाम सूझा और मैंने फोन लगाकर कहा कि सर ये लाइफ का सवाल है, मैं आपके यहां भिजवा रहा हूं, प्जील एडमिशन दिलवा दीजिए। दूसरी तरफ थे देश के जाने माने कॉर्डियोलॉजिस्ट पद्म विभूषण डा. पुरुषोत्तम लाल। पुराना रिश्त है और मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं। इसके कई कारण है। उन्होंने कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद कहा- कोई नहीं आप भेजो, मैं बोलता हूं। मरीज जब पहुंचा तो जो अस्पताल में थे उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। बोलो मामाल क्रिटिकल है। अभी आईसीयू है नहीं औऱ इनको आईसीयू में ले जाना पडेगा। मुझे मेरे उसी छोटे भाई जैसे सज्जन का फोन आया – भैया ये लोग तो एडमिट ही नहीं कर रहे। मैंने डा. लाल के असिस्टेंट जिनको डाक्टर साहब ने एडमिशन करवाने का काम दे रखा था, उनको फोन किया। मैंने कहा सुनो क्या मरीज अब ये ढूंढे कि किस अस्पताल में आईसीयू है? क्या तबतक ये बच पाएगा? आप एडमिट करो, ऑक्सीजन देना शुरु करो, दवाएं चलाओ – फिर आईसीयू देखेंगे। एडमिशन हो गया और रात 9 बजे फोन आया कि सुधार जारी है।
मैंने तो अपने कुछ जाननेवालों या दोस्तों की खातिर लड़ना शुरु किया लेकिन पिछले चार-पांच दिनों में इतने लोगों ने अपनी परेशानियां बतानी शुरु कीं, इतने लोगों को सख्त जरुरत आन पड़ी कि लगा अगर ईश्वर ने आपको कुछ लोगों का भरोसा बनाया है तो उसको बचाने की खातिर यह करते रहना ही ठीक है। आज जिस बात की तकलीफ है वो दो है। मेरे एक मित्र जो बिहार के पूर्णिया जिले के अच्छे खासे परिवार से आते हैं, उनके रिश्तेदार नोएडा के सेक्टर 29 के सरकारी अस्पताल में दाखिल है। उन्होंने फोन कर कहा कि उनसे बात ही नहीं हो पाती। कभी कभार जब अस्पताल के लोग परमिट करते हैं तभी बात होती है। कह रहे थे कि सुबह से किसी ने कोई दवा नहीं दी। मैं चलकर ही बाहर से अंदर आया और यह बताया भी कि मुझसे चला नहीं जा रहा है, सांस फूल रही है तो कर्मचारी ने कहा कोई बात नहीं आप चलिए हम ऑक्सीजन लगा देंगे। लेकिन वह दोबारा कभी आया ही नहीं। मेरे मित्र ने बताया कि वे बेहद डरे हुए हैं। कुछ भी करके उनकी दवाई शुरु करवा दीजिए। मैंने डीएम, कमिश्नर नोएडा को ट्वीट किया और पूरा हाल बताया। यह भी कहा कि मरीज की स्थिति क्या है, बताया जाए। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।यह प्रशासन का अधिकार नहीं है, उसकी नाकामी है। सरकारें और सरकारी सेवा के लोग जनता का काम करने के लिए हैं और जनता के पैसे पर हैं। इसलिए वे नहीं करेंगे या नहीं बताएंगे, उनके पास यह अधिकार नहीं है।हम जब अपने अधिकार छोड़ते हैं तो सामने वाला उनपर अनाधिकृत तरीके से कब्जा कर लेता है। कल मैं उन मरीज के बारे में पता करुंगा।
दूसरी तकलीफ गुड़गांव के एक कोविड केस को लेकर रही। एक महिला जो मेरे पुराने मित्र की भानजी हैं उनके ससुर एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती है। सारा परिवार पाजिटिव है इसलिए बाहर कोई जा नहीं सकता। ससुर को छोड़कर बाकी सब घर में क्वरंटाइन हैं। अस्पताल वालों ने पहले आसीयू में डाला, फिर ठीक हो रहे हैं कहकर वार्ड ले आए। फिर रेमडेसिविर देने के नाम पर बहुत कुछ किया, फिर बताया कि फेफड़ों में 40 परसेंट इंफेक्शन है, फिर कहा कि अब 60 परसेंट है। परिवार बाहर नहीं निकल सकता औऱ वो इस बात को लेकर बेचैन है कि उसके बुजुर्ग के साथ ये क्या हो रहा है। एक बात जो कहनी जरुरी है- इस भयावह तबाही में कुछ लोग मोटी कमाई कर रहे है। उनको जान की नहीं पड़ी है बल्कि वे इस काम में लगे हैं कि कितना निचोड़ लें, किसको ऐंठ दें,अगर शरीर लाश भी बन जाए तो उसपर भी पैसा बनाते रहो। ऐसे लोगों के साथ जो भी साथ जो भी हो सकता है होना चाहिए बिना ये सोचे कि गलत हुआ कि सही। सही गलत तो इंसान की खातिर सोचते हैं, हैवानों के लिए थोड़े! समय बहुत खराब है। बहुत ख्याल रखें अपना और अपनों का भी।
उसका फल ये रहा कि जिंदगियां बचीं। अगले दिन जब फोन आता है कि सर अब बच जाएंगे, ठीक हैं, शरीर के अंदर कुछ अच्छा सा पसरता हुआ लगता है। शायद वह आत्मा या रुह के उल्लसित होने से होता होगा।

साथ और संयोग से जीवन बचाने का संघर्ष

कोरोना डायरी 19 अप्रैल,2021 

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जिंदगी और मौत के बीच बस एक बारीक लकीर होती है, जैसे भरोसे और घात के बीच. यह जो बारीक-सी लकीर है उसमें कई चीजें शामिल होती हैं। समय, साथ, संसाधन और संयोग भी ( जिसे आप किस्मत कह सकते हैं)। कोरोना के इस बार के हमले में बचाव का कोई हथियार टिक नहीं रहा। स्वास्थ्य-व्यवस्था का खुद ही दम निकल चुका है। जैसे तेज तूफान में आदमी दोनों हाथों से आंख-नाक को बचाते हुए सिर दबाए रहता है, कुछ देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, सरकारों का हाल वैसा ही है। फिर बचा क्या? साथ और संयोग। संयोग ऐसा बन जाता है कि कोई खेवनहार मिल जाता है और उसी साथ की बदौलत जान बच जाती है।

आज दोपहर में एक साथी का फोन आया। एक नेशनल चैनल में एंकर हैं। सर, आसिफ नाम का एक आदमी है, पॉजिटिव है। उसकी पत्नी उसको लेकर अस्पतालों के चक्कर लगा रही है, लेकिन कहीं कोई बेड खाली नहीं है। उसका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिरता जा रहा है। कुछ हो सकता है? मैंने कहा- तुम एक मैसेज में उस आदमी का नाम, परेशानी, कॉन्टैक्ट पर्सन और मोबाइल नंबर लिखकर भेजो, मैं देखता हूं। काफी देर तक गाजियाबाद के वसुंधरा-वैशाली इलाके में ( आसिफ वहीं रहते हैं ) फोन घुमाता रहा, लेकिन कामयाबी कहीं नहीं मिली। मैंने अपने जिन लोगों को उस इलाके में लगा रखा था, वे भी कोशिश में थे। मेरे सहयोगी का फोन फिर आया- सर, कोई बात बनी? उस आदमी के पास समय कम लग रहा है।जल्दी कुछ करना होगा। मैंने कहा- दस मिनट और दो। छानबीन फिर शुरु की। इंडिया न्यूज के रिपोर्टर जतिन भी इसी काम में लगे थे। उनका फोन आया - सर, एक बेड मिल गया है, लेकिन उनकी पत्नी फोन उठा नहीं रही हैं। मुझे राहत मिली कि चलो बेड मिला । मैंने कहा तुम दो मिनट रुको, मैं अभी बोलता हूं। अपने एंकर साथी को मैंने फोन लगाया- अरे यार, तुम उनकी पत्नी को बोलो फोन उठाएं, बेड मिल गया है। उन्होंने कहा बस एक मिनट, मैं उनको अभी कहता हूं। फोन एक मिनट तो नहीं बल्कि लगभग पांच मिनट बाद आया। सर, वो आदमी गुजर गया। इसीलिए उसकी पत्नी फोन नहीं उठा रही थी। आंख के आगे अंधेरा सा छा गया। इंसान सांस-सांस के लिए तड़पकर जान गंवा दे रहा है।
इस घटना के थोड़ी ही देर बाद एक मित्र जो हिंदी की दमदार युवा लेखिका हैं, उनका फोन आया। एलएनजेपी में एक महिला एडमिट हैं, 25 साल की है और चार महीने की गर्भवती हैं। उनका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा है, क़ॉम्लिकेशन बढ रहा है, वेंटीलेटर चाहिए। मैंने कहा- आप बस यही सब नाम और नंबर डालकर मैसेज कीजिए। मन ही मन डरा हुआ था। एक हादसा गुजर चुका है, पता नहीं इस मामले में क्या हो। उनका मैसेज जैसे आया, मैंने उसे तुरंत आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडे को फॉर्रवर्ड किया और लिखा कि भाई कुछ भी करो लेकिन वेंटिलेटर दिलवाओ। दो जान का सवाल है। दिलीप का जवाब हर बार फौरन आता है। उन्होंने कहा- भैया बताता हूं। जब देर होने लगी तो मैंने एक और मैसेज डाला। भाई, तुम जल्दी कुछ करो, हमारी मित्र भी परेशान हैं। दिलीप का जवाबी व्वॉयस मैसेज आया। सॉरी भैया, बताना भूल गया था। हो गया, उनको वेंटिलेटर पर डाल दिया गया होगा या डाला जा रहा होगा। लेकिन प्रॉ़बल्म सॉर्टेड। इसके कुछ देर बाद हमारी मित्र ने मैसेज डाला- "शु्क्रिया, काम हो गया। मुझे अब राहत मिली।" राहत मुझे भी मिली। दो जिंदगियां अस्पताल के अंदर साधन की कमी के चलते बचाई ना जा सके यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन आज कल ऐसा ही है। इंसान को बचाया जा सकता है, लेकिन ना तो ऑक्सीजन है, ना रेमडेसिविर ( अगर मरीज को चाहिए तो) और ना बेड। लेकिन यह महिला खुशकिस्मत थीं और वो मासूम बच्चा भी जो अभी आया भी नहीं है। साथ और संयोग से ऐसे ही जीवन बचाने का संघर्ष चल रहा है। मैं यह जरुर कहूंगा कि दिल्ली में एक आदमी जो तमाम तरह की कमियों-खामियों के बावजूद लोगों की मदद में दिन-रात जुटा है, वो हैं दिलीप पांडे। मेरे निवेदन पर यह तीसरी जान है जिसको उनकी कोशिशों ने बचाया है। दिलीप की जितनी तारीफ करें कम है।