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रविवार, 5 जुलाई 2015

आशा

रात-विरात
दिन-दोपहरी
वह मेरे आंगन में गिरी
धम.
कणों में कंपन हुआ
हवाओं में स्फुरण
आकाश में बिजली
कौंधी.
मैंने खिड़की से बाहर देखा
नंगे पर्वतों पर
बर्फ जम आई थी
वह नदी से लौट रही थी
तेज़कदम.
बाग में फूल निकल आए थे
दरवाज़े पर दस्तक हुई
खट.
आकाश से
बूंदे टपकीं
टप..टप..टपाटप.

टीवी पत्रकार और मित्र शैलेेंद्र का जाना

स्याही भर सपना
आंख भर पानी
और छाती भर रिश्ता
इससे ज्यादा उसे
कुछ चाहिए भी नहीं था.

उसमें बची थी
ठंडे चूल्हों की आंच
ज़िंदा थी
बंजर होते जाने की बेचैनी
बाकी था
पसीने में नमक भी
नहीं तो लीक को लतिआने की ताकत
ख़बरखोरी ने छोड़ी कहां है.

वक्त सोख लेगा
कपड़ों में बसी उसकी गंध
तस्वीरों पर धुंध डेरा डाल देगी
सूख जाएगा
शब्दों का हरसिंगार
लेकिन जब कभी कोई
क़दभर ही नज़र आएगा
या कोई आवारा
सड़कों को रातभर जगाएगा
वो अगले मोड़ पर
सजधज कर
नई नज्‍म के साथ नज़र आएगा.

( जून २००९ - शैलेंद्र के साथ आजतक में काम किया और कई दफ़ा साथ बैठकर घंटो गपिआए. )

कटोरा भर पानी

चाबी की नाव चलाने के लिए
बंटी को चाहिए
कटोरा भर पानी.

आटा गूंधने के लिए
मां को चाहिए
कटोरा भर पानी.

आंगन में चांद उतारने के लिए
बालेश्वर चाची को चाहिए
कटोरा भर पानी.

आचमन के लिए
पापा को चाहिए
कटोरा भर पानी.

छोटू के निपटान के लिए
दादी को चाहिए
कटोरा भर पानी

दादा की हजामत के लिए
सुदर्शन ठाकुर को चाहिए
कटोरा भर पानी.

कपड़ों पर इश्तरी के लिए
रामायण धोबी को चाहिए
कटोरा भर पानी.

एक भरी पूरी गृहस्थी को
चाहिए ही चाहिए
कटोरा भर पानी.

लेकिन दुनिया के लिए
मुश्किल हो रहा है बचा पाना
कटोरा भर पानी.

( कॉलेज के दिनों की कविता, जून १९९५ ) 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

मेरे हमदम

मेरे हमदम तेरे आगे मैं इक अफसाना लिखता हूं
थोड़ा ज़िद्दी,थोड़ा पागल,थोड़ा दीवाना लिखता हूं.
तुझे ज़िद है कि मैं बोलूं, मेरी मुश्किल पुरानी है
ज़ुबां दिल की मिले फिर मैं, दिन रात लिखता हूं.
कई रातों की उलझन है, कई बातें सुनानी हैं
जो धरती से कहे चंदा, वो सारी बात लिखता हूं.
मुझी से है मोहब्बत और मुझसे ही लड़ाई है
तू भी तो यार है मुझसा,यही हर बार लिखता हूं.
कहीं रिमझिम, कहीं रुनझुन,कहीं रुत आसमानी है
तू मौसम है मेरे दिल का, मेरी कायनात, लिखता हूं.
ज़मीं होकर फ़ना होना, फ़ना होकर ज़मी होना
सनम इस इश्क़ पे सौ जिंदगी क़ुर्बान लिखता हूं.