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शुक्रवार, 19 जून 2015

कार्तिक की एक शाम

गीली शाम बरसती है
कुछ कहती है
जवान ज़मीन खनकती है
कुछ कहती है,
सिली सिली साँझ के स्याह उजाले
रात झूमती चलती है
कुछ कहती है.

अफसाने

कई दर्द उभर आए तेरे जाने के बाद
अब इक तारा गायेगा दिन जाने के बाद.
मेरी कलम ने भी गढे थे अफसाने
बस अफसाने हैं अफसनों के बाद.

नक्सल


बारूदी गंध बुनती है
रात भर सपने आग के
जंगलों में उतरे हैं
जुगनू सरकार के.
गयी रात मैं जगा हूँ
कोई तो बात है
अब हाथ बदल गए हैं
हथियार के.

एक सवाल



कभी सन्नाटों से बातें करना याद आता होगा
कभी रिमझिम का संगीत आकर गुदगुदाता होगा
कभी बस्ती की वीरान दोपहरी भी खींच ले जाती होगी
कभी उसके होठों के गीले कोरों की मिठास ज़ुबान पर आज भी घुल जाती होगी
और कभी कामयाबी की इतनी मंज़िलें लांघने के बाद..
एक सवाल पास बैठ पूछता होगा...
इस आधी गीली आधी सूखी ज़िन्दगी का क्या किया जाए???