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शुक्रवार, 19 जून 2015

सच

सुबह तक जगना है मुझे, रात ज़रा सोने दो
सच सपनों में बचा है बस, उसको भी डुबोने दो

बरसात की रात


रात बरसी है रात भर
सुबह नहाकर आई है रात भर
रात भर कमबख़्त ख्वाब घेरे रहे
नींद जगाती रही रात भर.

सोमवार, 15 जून 2015

गुमां सी ज़िंदगी



भरम ही सही जिंदगी पर कुछ नाज़ कर लूं ज़रा 
सीने में सांस, हथेली में रोशनी बंद कर लूं ज़रा

पता है सोने के खेतों में फ़सलें नहीं उगतीं
क्या हुआ गर हुनर अपना भी आज़मा लूं ज़रा

कुछ टूटता रहा अंदर, उनके जाने की बात पर
मैं पानी हूं ये यकीन उनको दिला लूं ज़रा

कागज़ की कश्तियों की उम्र सा हूं नामुराद
बस दरिया के सीने में फना हो लूं ज़रा

शुक्रवार, 12 जून 2015

तुम रहना




तुम रहना ता
कि उम्मीद बची रहे
जैसे ठूंठ पीपल की फुनगी पर बची है एक कोंपल
तुम रहना ताकि विश्वास बचा रहे
जैसे मेरे गांव की बाबू टोली में बचा है सुभान मियां का घर
तुम रहना ताकि ईमान बचा रहे
जैसे बचा है मेहनत मजूरी के पैसे में नमक
तुम रहना ताकि पहचान बची रहे
जैसे बची हैं कुछ फसलें वर्णशंकर बीजों से 
तुम रहना ताकि हंसी बची रहे
जैसे बचा है दिनभर देह पीटकर लौट रही मां के सीने में उतरता दूध
तुम रहना ताकि रसोई बची रहे
जैसे बचा है घर में पिज्जा बर्गर के बावजूद जीभ पर दाल भात का स्वाद
तुम रहना ताकि प्यार बचा रहे
जैसे बची रहती है कड़कड़ाती ठंड में भी तुम्हारी हथेलियों की गरमाहट


तुम रहना