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शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

मलेशिया में तीन रातें

- सुबह के लगभग नौ बज रहे थे । मैं और मेरे मित्र लौटने के लिये क्वालालंपुर एयरपोर्ट के वेटिंग लाउंज में बैठे थे। अचानक पीछे बैठे सज्जन की आवाज ऊंची हुई – भैया का हाल है । प्रदीप सिंह मलेसिया से बोल रहे हैं । आप तो सो रहे होंगे , यहां देखिए सुबह के 9 बज गये हैं और हम फ्लाइट से अब इंडिया लौटनेवाले हैं । बाकी सब ठीक है ना, बस आते हैं तो मिलते हैं....इसके बाद अगले 20 सेकेंड तक कोई आवाज नहीं आई । प्रणाम दीदी , प्रदीप मलेसिया से बोल रहा हूं, समझ लो कि इंडिया से कोई मुकाबला नहीं है , यहां की बिल्डिंगें, सड़कें, डेभलपमेंट – सब एकदम धांसू

टाइप है । हमलोग दिल्ली में तो लगता है साला कबाड़ का लाइफ जी रहे हैं। लाइफ तो यहां है । प्रदीप सिंह का फोन लगातार चल रहा था औऱ लगता था कि क्वालालंपुर में जो लोकल सिम उन्होंने ली होगी उसमें जितनी रकम बची थी, फ्लाइट के निकलने से पहले निपटा देना चाहते थे। लेकिन इससे कहीं ज्यादा जरुरी ये था कि प्रदीप जी बचे वक्त औऱ बची रकम में सभी जाननेवालों को ये बता देना चाहते थे कि वो तीन रोज पहले फ्लाइट से मलेशिया आए थे औऱ फ्लाइट से ही इंडिया लौटनेवाले हैं । उनके मुताबिक मलेशिया नाम के इस देश का कूड़ा भी इंडिया के कंचन से ज्यादा चमकदार है। कौन...डीके यादव जी एमवे वाले बोल रहे हैं। अरे सर नमस्कार , प्रदीप सिंह मलेसिया से बोल रहा हूं...यहीं का नंबर दिख रहा होगा आपको...आकर लिया था...तीन दिन पहले आया प्राइभेट टूर पर...साला यहां कूड़ा तो दिखता ही नहीं है...हार्न कभी बजता ही नहीं...जिधर देखिए एकदम चमचमाता रहता है ....एक बात कहूं भाई साहब साला रहने का मजा तो यहीं है...हमलोग साला क्या लाइफ जी रहे हैं....और यहां देखेंगे तो दिमागे हिल जायेगा। प्रदीप जी का फोन अपने मिशन पर लगा हुआ था औऱ पूरे वेटिंग लाउंज में उनकी आवाज गूंज रही थी । मैंने पीछे मुड़कर उनके दर्शन करने चाहे – गोरा रंग, घुंघराले बाल जो सामने से आधे सिर का साथ छोड़ चुके थे, कतरी हुई बारीक मूंछें और बड़ी बड़ी कंचे जैसी आंखें जो बाहर की तरफ निकली हुई थीं।

प्रदीप सिंह कोई इकलौते भारतीय नहीं हैं जिन्होंने विदेश में भी देसी माहौल का पूरा पूरा अहसास कराया । पिछले तीन दिनों में कई बार ऐसा लगा कि हम दिल्ली के ही किसी हिस्से में हैं। ऐसा सबसे ज्यादा बातू केव्स के मुरुगन मंदिर में लगा जिसमें प्रवेश करते ही गायत्री मंत्र बजता सुनाई पड़ा और अंदर भारतीयों खासकर दक्षिण भारत के लोगों की बड़ी तादाद मौजूद थी। क्वालालंपुर में बड़ी तादाद में दक्षिण भारतीय लोग पीढियों से रहते हैं , अच्छा कारोबार संभाले हुए हैं औऱ अपनी परंपरा- संस्कृति से आज भी गहरे जुड़े हुए हैं। मरुगन मंदिर पहाड़ के अंदर एक प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है जहां तक जाने के लिये 306 सीढियां चढनी पड़ती हैं। गुफा के द्वार पर पहुंचकर सांसे तो उखड़ गयी थीं लेकिन आंखों के सामने जो कुछ था उसने रोमांचित कर दिया। पहाड़ अंदर से यूं कटा हुआ था जैसे किसी विशाल मंदिर का गर्भगृह हो । उसके एक हिस्से में बड़ा-सा सुराख था जिससे रौशनी आ रही थी । गुफा में सौ कदम आगे पूरा उजाला नजर आ रहा था औऱ हम ये समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर ये रौशनी आ कहां से रही है । वहां पहुंचकर हमने देखा कि पहाड़ ऊपर से खुला हुआ है...बिल्कुल गोल। जैसे किसी ने गुंबद में ऊपर का हिस्सा खोल दिया हो। ये आंगन जैसी जगह है – जिसके चारों ओर देवताओं की मूर्तियां-मंदिर हैं। इन्हीं में आंगन की एकतरफ औऱ प्रवेश द्वार के ठीक सामने मुरुगन का मंदिर है। यहां श्रद्दालुओं के आने जाने का तांता लगा रहता है । सीढियां उतरते वक्त ये अहसास हो रहा था कि हमने घंटा भर पहले अपना फैसला बदलकर बहुत अच्छा किया । दरअसल मैं औऱ मेरे मित्र मलेशिया घूमने आये औऱ यहां आकर हमने ये तय कर लिया कि दोनों भले ना सोएं लेकिन घूमने-देखने का कोई मौका नहीं गंवाएंगे। क्वालालंपुर पहुंचने के अगले दिन जब हम गेंटिंग जा रहे थे तो हमारे ड्राइवर महमूद ने बताया कि रास्ते में मुरुगन मंदिर आएगा, आपलोग चाहें जो देख सकते हैं। महमूद की बात पूरी हुई कि सामने बारिश आती दिखी औऱ जब हम बातू केव्स पहुंचे तो तेज हो चली थी । दस कदम पर सौ फीट से ज्यादा ऊंची, बिल्कुल सुनहरे रंग की मुरुगन की काफी भव्य मूर्ति खड़ी थी । इसकी दांयी तरफ एक गेट था जिससे अंदर जाने पर आगे सीढियां शुरु होती हैं । सीढियों की पांत जहां खत्म होती है वहां एक बड़ी सी गुफा दिखती है । बारिश देखकर हमने ये तय किया कि ऊपर नहीं जाते हैं , जितना देखना है गाड़ी से ही देख लेते हैं। आखिर इससे ज्यादा और होगा भी क्या ऊपर । लेकिन थोड़ी ही देर में मन बदल गया – हमारे मित्र ने कहा यार जब यहां आ ही गये हैं तो बारिश के चलते जाना क्यों रोकें औऱ गाड़ी में महमूद भाई ने छाता रखा ही है – लेकर निकल पड़ते हैं। हमने फिर कोई बात नहीं कि बस निकल गये। लौटकर हम दोनों ने एकदूसरे का चेहरा देखा और साथ ही बोल पड़े – यार मजा आ गया। महमूद ने बात जोड़ी – सर आपलोग यहां नहीं जाते तो बहुत कुछ मिस कर जाते। अब चलिए गेंटिंग निकलते हैं। बारिश खत्म हो चुकी थी औऱ तेज धूप निकल आयी थी। चारों ओर छोटी छोटी पहाड़ियां ,उनके बीच से भागती सुंदर सरपट सड़क, सड़क के दोनों तरफ घासकटाई करते या तरतीब में लगाये गये पौधों की छंटाई करते कुछ लोग कहीं कहीं दिख जा रहे थे। बीच बीच में पाम की कई कई किलोमीटर लंबी खेती आपके दोनों तरफ आ जायेगी तो कहीं कहीं पहाड़ियों की चोटी तक पेड़ों की घनी पांत नजर आयेगी । क्या मजाल जरा सी भी जगह नंगी मिल जाये । ऐसे लगता है कि सबकुछ कायदे-करीने औऱ सांच में ढाल दिया गया है । गाड़ी भाग रही थी – रफ्तार सौ से ऊपर रही होगी। मैंने अचानक पूछा – महमूद मियां आपका शहर कौन सा है । जवाब आया – मुल्तान । साल में कितनी बार घर जा पाते हैं । बस एक बार – लेकिन महीना से कम नहीं रहता। ये बताईए कि पाकिस्तानी करेंसी में यहां कितना कमा लेते हैं । उम्म्म्म्म...यही कोई सत्तर हजार के आसपास । मैने कहा – ये तो बहुत अच्छा है । फिर आप यहीं कमाओ औऱ पैसे जमा करके अपने शहर में जमीन जायदाद बना लो । पाकिस्तान में इतना कहां कमा पाओगे । हां सर वहां जिंदगी ही सलामत रहती है तो इंसान गनीमत मानता है – कमाने की तो छोड़िए। जब से गिलानी साहब पीएम हुए हैं, मुल्तान के होने के चलते कुछ काम धाम जरुर शुरु हुआ है...जमीन की कीमत ऊपर जा रही है। तो फिर आप जमीन में ही पैसा लगाओ- मैंने कहा । हां सर इस बार गया था तो जमीन ही खरीदी – जायेगी तो कुछ देकर ही जायेगी। महमूद से हमारा परिचय होटल के बाहर हुआ जब वो हमें गेंटिंग के लिये पिक करने आये। सर गुड मार्निंग – मेरा नाम महमूद है, आपलोगों को गेंटिग के लिये पिक करने आया हूं- रिसेप्शन से कमरे में फोन आया था औऱ हमने ये कहकर रख दिया कि बस दो मिनट में आये । नीचे आये तो महमूद ने हमें दोबारा नमस्ते किया औऱ लगेज गाड़ी में रखने लगे। करीब 5 फुट 8 इंच , हट्ठा कट्ठा डील डौल औऱ ऊर्दूवाली जुबान। गाड़ी में बैठते ही मैने पूछा – महमूद मियां कहां से हैं आप । सर पाकिस्तान । तो यहां कब से । सर दस साल हो गये होंगे । अच्छा अच्छा , कल हमें एयरपोर्ट पर जिन्होंने पिक किया था – मिस्टर साजिद , वो भी पाकिस्तान के ही थे। पाकिस्तान के कितने लोग होंगे यहां। सर, काफी हैं – ज्यादातर टूर ट्रैवल औऱ होटल के धंधे में मिलेंगे आपको। हम्म्म्म्म...गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली औऱ हमलोग सड़क के दोनों ओर खड़े शहर में खो गये।

आगे जारी है....

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

नीरा राडिया

वो शैतान के जादू की शापित छड़ी है

रात बिछाती है दिन में

रात में दिन पसारती है

कौवों को सफेद

कबूतरों को काला बनाती है ।


देवलोक की गुफाओं में

अबूझ कंदराओं में

कुबेर का करिश्माई दीया है

हर आराध्य बड़ा साफ दिखता है

मरी मुरादों को भी संजीवनी पिलाता है ।


उसने खुद खड़ा किया है अपना इंद्र

मेनका की मृगतृष्णा बनाई है

नारद की वीणा के राग गढे हैं

लक्ष्मी के कदम साधे हैं

वो मायानगरी की सबसे बड़ी माया है ।


उसने सोख लिया है धरती का रस

छीन ली है वेताल की शक्ति

पंगू कर दिए हैं यक्ष के प्रश्न

पहाड़ भी पनाह मांगता है

उसने शेषनाग को साध रखा है ।

1 दिसंबर 2010, बिहार : सियासत की नयी सुबह

1989 के चुनाव थे औऱ विश्वनाथ प्रताप सिंह की लहर चल रही थी। मैं कुछ किताबें खऱीदने के लिये गांव से जिला मुख्यालय छपरा आया हुआ था। छोटे से शहर में चारों ओर वीपी सिंह के स्वागत के पोस्टर बैनर पटे पड़े थे। छपरा लोकसभा सीट से लालू प्रसाद यादव जनता दल के प्रत्याशी थे और वीपी सिंह उन्हीं के लिये रैली करने आनेवाले थे. नगरपालिका मैदान अटा पड़ा था औऱ मैं धक्का मुक्की के बीच आहिस्ता आहिस्ता मंच के पास जा पहुंचा था। उन दिनों राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी लेकिन बस मन इस बात के लिये ललचा हुआ था कि राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स घोटाले की आंधी खड़ा करनेवाला नेता सामने से कैसा दिखता है औऱ कैसा बोलता है। आगे पीछे चारों ओऱ बस सिर ही सिर दिख रहे थे औऱ इसी बीच अगियाबैताल की तरह एक रेला आया औऱ मेरे जैसे तमाम लोगों को मंच के आसपास धकेलता हुआ ऊपर पर चला गया । इस रेले में लालू थे औऱ वीपी सिंह भी । अजीब उन्माद सा था, लोग कांग्रेस सरकार को सबक सिखाने की बातें कर रहे थे लेकिन तब भी लोगों को ये पता नहीं था जिस घोटाले की बात बवंडर बनी हुई है वो कितने का है औऱ क्या है। खैर, मैंने ये जिक्र इसलिये किया क्योंकि उसी बवंडर में लालू की राजनीतिक किस्मत चमक रही थी । वो पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे । वीपी सिंह ने मंच पर उनका हाथ पकड़कर हवा में उठाया औऱ लोगों से अपील की कि अगर आप देश का भला चाहते हैं तो लालू प्रसाद यादव को वोट देकर हमें दिल्ली में मजबूत करें। सामने की भीड़ से बार बार शोर उठ रहा था – वीपी सिंह जिंदाबाद, लालू यादव जिंदाबाद ।

बोफोर्स कांड की उस लहर में लालू संसद पहुंच गये औऱ तुरंत हुए विधानसभा चुनाव में जनता दल की तरफ से मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हथिया ली। लालू के पास जबरदस्त जनाधार था, कमजोर तबके का गुदड़ी का लाल बिहार की गद्दी पर बैठा था औऱ बिहार के दलित-पिछड़ों में लालू के लिये अजीब सा लार था। बिहार में गैर कांग्रेस राजनीति का एक नया अध्याय शुरु हुआ था औऱ दलित-दमित समाज में ये आस जगने लगी थी कि अब मंगरुआ बाबू साहेब की मार नहीं खायेगा या लुटावन दुसाध का पूरा खानदान मालिक के यहां दिनभर एक शाम के खाने पर देह नहीं पीटेगा। कुछ ना कुछ होगा। लालू ने इसी आस औऱ गरीब गुर्बों के दिन फिरने की उम्मीद में बातें बनाते रहे, मस्खऱी करते रहे औऱ हालात बद से बदतर होते गये। हां इतना जरुर हुआ कि किसी भी बात पर पिट जानेवाला गरीब थाने जाने लगा, उसकी शिकायत दर्ज होने लगी , पुलिस जेब गरम करने से पहले दबंगों के टोले में दबिश मारने लगी औऱ लुटावन दुसाध का परिवार ये कह पाने की हिम्मत जुटाने लगा कि मालिक आज काम है नहीं आ पायेंगे। ये बराबरी के अधिकार की लाइन पर खड़ा हो रहा ऐसा सामाजिक बदलाव था जिसको अगर विकास की जमीन मिलती तो लालू इतिहास पुरुष हो जाते । लेकिन वक्त के साथ साथ अपराध औऱ अंधेरगर्दी के बीच बिहार इसकदर पिसने लगा कि हर तबका एक अजीब सी ऊब औऱ सड़ांध से निकल भागने को बेचैन दिखने लगा। चारा घोटाले में फंसने के बाद लालू ने कुर्सी राबड़ी को भले दे दी लेकिन राज उन्हीं का था औऱ शायद ये कहने की जरुरत भी नहीं है। इस लालू राज में यादवों का गुंडाराज औऱ लाठी के बल पर दूसरों के हक को हथियाने का ऊपर से नीचे तक का खेल भी बड़ा भयानक हो चला था।

दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपनी सूझबूझ औऱ विकासपरक नीति के आसरे अपनी राह बनाने में लगे रहे। जनता दल के टूटने के बाद उन्होंने लालू से राह अलग कर ली औऱ जनता दल यूनाइटेड के बैनर तले लालू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। वाजपेयी की 13 महीने की सरकार हो या फिर 1998 के बाद की पांच साल वाली सरकार - दोनों में नीतीश ने अपने कामकाज की छाप छोड़ी। खासकर बतौर रेलमंत्री उन्होंने एनडीए सरकार में बेहतरीन काम किया । नीतीश ना तो अपना ढोल पीटते हैं ना ही मस्खऱी उनकी फितरत में है। उन्हें फूहड़ भोजपुरिया मुहवरों को मुंह फाड़ फाड़ बांचकर ताली बटोरने का हुनर भी नहीं आता। बस काम आता है और ईमानदारी से काम करते हैं- ये बात धीरे धीरे आम आदमी भी समझने लगा था। बिहार के गांव कस्बों की जमीन को भी लालू का फरेब औऱ नीतीश की नीयत का फर्क समझ में आ गया था । नतीजा ये हुआ कि 2005 के चुनाव में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को लोगों ने सत्ता में भेजा औऱ नीतीश ने सरकार की कमान संभाली। पिछले पांच साल में नीतीश ने ना तो बड़े बड़े दावे किये ना ही बोल बोले। लेकिन हां 60 महीनों में बिहार का शायद ही कोई गांव-टोला होगा जहां ईंटवाली सड़क ना दौड़ी हो, प्राइमरी स्कूल की नयी बिल्डिंग ना खड़ी हुई हो औऱ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की हालत ना सुधरी हो। औऱ हां राज्य के भीतर दौड़नेवाली सड़कें – सड़क में गढ्ढा कि गढ्ढे में सड़क की पहेली से बाहर आ गयीं। जाहिर है ये कोई करिश्मा नहीं है औऱ ना ही विकास का कोई बड़ा मानक लेकिन 15 साल में लोगों ने जो नर्क भोगा उस लिहाज से ये बेहतर दिनों के आने की उम्मीद सी जरुर था। नतीजा ये हुआ कि इस बार नीतीश को लोगों ने इतना वोट दिया कि इतिहास बन गया और लालू को इतना धकिआया कि अब वो किसी को धक्का देने की हालत में भी नहीं रहे। लोकतंत्र की ये सबसे बड़ी ताकत कही जानी चाहिये । ऊपर से सबक ये कि लोगों में बेहतरी औऱ विकास के लिये सही विकल्प चुनने की समझ आ गयी है , दौर बदल रहा है , जात-पांत के बंधनों की आड़ में अपना उल्लू सीधा करनेवाले नेताओं के दिन लदने लगे हैं औऱ ये हिंदुस्तान में राजनीति के एक नये अध्याय की तरफ इशारा है।

विकास की बुनियाद पर दिल्ली में शीला दीक्षित, गुजरात में नरेंद्र मोदी औऱ उड़ीसा में नवीन पटनायक बार बार सत्ता में जरुर लौटे हैं लेकिन इन तीनों राज्यों के सामाजिक गिरहपेंच औऱ राजनीति के यक्ष प्रश्न बिहार से कहीं अलग हैं। इसीलिये मैं इस बात पर जोर दे रहा हूं कि नीतीश की बिहार में वापसी देश में राजनीति में राजनीति की एक नयी दिशा का संकेत दे रही है। नीतीश कुमार के सामने चुनौतियां बड़ी हैं, उम्मीदों का पहाड़ खड़ा है , करने को बहुत कुछ है लेकिन उन्हें इस भरोसे के साथ छोड़ा जा सकता है कि उन्हें विकास के मायने पता हैं औऱ आज की तारीख में वो नेतृत्व का बेहतर विकल्प हैं । कुछ हद तक ये भी मान जा सकता है कि उनकी नीयत नेक है औऱ उनमें राज्य के लिये कुछ करने की मजबूत इच्छाशक्ति दिखती है ।